एबीसी डेस्क 23 दिसंबर 2025
बांग्लादेश में जारी राजनीतिक और सामाजिक अशांति के बीच वहां रह रहे भारतीय नागरिकों, खासकर छात्रों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। इसी माहौल को बयां करते हुए पश्चिम बंगाल की एक छात्रा ने कहा है कि मौजूदा हालात में उसे हिंदू होने से ज़्यादा भारतीय होने का डर महसूस हो रहा है। छात्रा बांग्लादेश में पढ़ाई कर रही है और उसने कहा कि हालिया घटनाओं के बाद आम भारतीय छात्रों के मन में असुरक्षा का भाव गहराता जा रहा है। उसके शब्दों में, “अब डर इस बात का नहीं है कि हम किस धर्म के हैं, बल्कि इस बात का है कि हम भारत से हैं।”
छात्रा ने बताया कि हाल के दिनों में बांग्लादेश के अलग-अलग हिस्सों में जो हिंसा, तोड़फोड़ और विरोध-प्रदर्शन देखने को मिले हैं, उन्होंने विदेशी नागरिकों को मानसिक रूप से परेशान कर दिया है। कई जगहों पर भारत-विरोधी नारों और गुस्से भरे माहौल ने डर को और बढ़ा दिया है। छात्रा के अनुसार, लोग खुले तौर पर कुछ नहीं कहते, लेकिन बातचीत और नजरों में तनाव साफ झलकता है। वह कहती है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी—क्लास जाना, बाहर निकलना, बाजार जाना—अब पहले जैसी सहज नहीं रही।
भारतीय छात्रों का कहना है कि उन्हें अब ज़्यादा सतर्क रहना पड़ रहा है। वे समूह में निकलने की कोशिश करते हैं और बेवजह किसी से बहस या बातचीत से बचते हैं। कई छात्र अपने परिवार से रोज़ संपर्क में हैं और भारत लौटने के विकल्प पर भी सोचने लगे हैं। छात्रा ने बताया कि उसके माता-पिता लगातार फोन कर हालचाल पूछ रहे हैं और हर कॉल के अंत में यही कहते हैं कि “खुद का ध्यान रखना।” यह डर केवल शारीरिक सुरक्षा का नहीं, बल्कि मानसिक दबाव का भी है, जो धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है।
बांग्लादेश में मौजूदा हालात को लेकर भारत सरकार भी स्थिति पर नजर बनाए हुए है। भारतीय उच्चायोग की ओर से समय-समय पर एडवाइजरी जारी की जा रही है और भारतीय नागरिकों से सावधानी बरतने को कहा गया है। छात्रों को किसी भी आपात स्थिति में दूतावास से संपर्क में रहने की सलाह दी गई है। इसके बावजूद, ज़मीनी हकीकत यह है कि अनिश्चितता का माहौल लोगों को भीतर से डरा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है—क्या राजनीतिक अस्थिरता और भीड़ की हिंसा का सबसे पहला शिकार आम लोग और छात्र ही बनते हैं? जिस उम्र में पढ़ाई, भविष्य और सपनों की चिंता होनी चाहिए, उस उम्र में डर और असुरक्षा ने जगह बना ली है। पश्चिम बंगाल की इस छात्रा की बात सिर्फ उसकी अपनी नहीं है, बल्कि बांग्लादेश में रह रहे कई भारतीयों की मन की आवाज़ बनकर सामने आई है, जो फिलहाल उम्मीद और भय के बीच झूल रहे हैं।




