एबीसी डेस्क 20 दिसंबर 2025
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भारतीय सेना में अहीर रेजिमेंट के गठन की मांग को एक बार फिर दोहराया है। उन्होंने कहा कि यह कोई नई मांग नहीं है, बल्कि लंबे समय से देशभर में अहीर समाज और पूर्व सैनिकों द्वारा उठाई जाती रही है। अखिलेश यादव का कहना है कि अहीर समाज का देश की सुरक्षा और सेना के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है, जिसे सम्मान और औपचारिक पहचान मिलनी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि सेना में अलग-अलग रेजिमेंट्स का गठन परंपरा, बहादुरी और ऐतिहासिक योगदान के आधार पर हुआ है, ऐसे में अहीर रेजिमेंट की मांग पूरी तरह जायज है।
अखिलेश यादव ने कहा कि अहीर समाज के सैनिकों ने आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद देश की रक्षा में असाधारण साहस दिखाया है। उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध का उल्लेख करते हुए कहा कि रेजांग ला की लड़ाई में अहीर सैनिकों की वीरता देश के सैन्य इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उस युद्ध में बड़ी संख्या में अहीर जवानों ने अदम्य साहस का परिचय दिया और आखिरी सांस तक देश की सीमाओं की रक्षा की। अखिलेश यादव ने कहा कि ऐसे बलिदानों को याद रखना और उन्हें संस्थागत सम्मान देना सरकार की जिम्मेदारी है।
सपा प्रमुख ने यह भी कहा कि अहीर रेजिमेंट का गठन न केवल ऐतिहासिक न्याय होगा, बल्कि इससे युवाओं में देशसेवा की भावना और अधिक मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और देश के अन्य हिस्सों में अहीर समाज के लाखों युवा सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहते हैं। अगर अहीर रेजिमेंट बनाई जाती है तो यह इन युवाओं के आत्मसम्मान और प्रेरणा को और बढ़ाएगा।
अखिलेश यादव ने केंद्र सरकार से अपील की कि वह इस मांग को राजनीतिक नजरिये से नहीं, बल्कि देशहित और सेना की परंपराओं के संदर्भ में देखे। उन्होंने कहा कि सेना को राजनीति से दूर रखना जरूरी है, लेकिन सेना में रेजिमेंट्स का गठन किसी समाज या क्षेत्र के गौरवशाली सैन्य इतिहास को मान्यता देने का तरीका भी होता है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को इस विषय पर संबंधित पक्षों, पूर्व सैनिकों और रक्षा विशेषज्ञों से बातचीत करनी चाहिए।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि समाजवादी पार्टी इस मांग के साथ खड़ी है और आगे भी लोकतांत्रिक तरीके से इसे उठाती रहेगी। अखिलेश यादव के अनुसार, अहीर रेजिमेंट का गठन केवल एक समाज की मांग नहीं, बल्कि देश के सैन्य इतिहास को सम्मान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।




