अवधेश कुमार । नई दिल्ली 6 दिसंबर 2025
किसी की मां अस्पताल में, किसी का करियर दांव पर… इंडिगो संकट ने खोली ‘बेहतर व्यवस्था’ के दावों की पोल
देश में व्यवस्था कितनी चरमराई हुई है, इसका सबसे दुखद और वास्तविक दृश्य इन दिनों एयरपोर्ट्स पर दिखाई दे रहा है। इंडिगो की बड़ी संख्या में उड़ानों के रद्द होने से यात्रियों की जो पीड़ा सामने आई है, उसने पूरे तंत्र की नाकामी को उजागर कर दिया है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु समेत कई शहरों में घंटों लाइनें, ठप सेवाएँ और रोते-बिलखते यात्री—यह सब एक ही संदेश दे रहे हैं कि मोदी सरकार के “विकास मॉडल” का जमीनी सच कुछ और है। कई यात्रियों ने बताया कि किसी की मां अस्पताल में भर्ती है, कोई अपनी इंटरव्यू डेट नहीं पकड़ सका, तो किसी का विदेश में करियर उड़ान रद्द होने की वजह से बर्बाद हो गया।
यह स्थिति केवल इंडिगो की गलती नहीं, बल्कि एक गहराई तक फैली अव्यवस्था का परिणाम है। जब सरकार दावा करती है कि देश की व्यवस्था विश्वस्तरीय है, तो फिर ऐसी आम-जनजीवन से जुड़ी सेवाएँ बार-बार क्यों ठप पड़ रही हैं? अगर एक साधारण यात्री समय पर अस्पताल तक नहीं पहुंच पा रहा, अगर युवाओं के करियर सिर्फ इसलिए टूट रहे हैं कि फ्लाइट मॉनिटरिंग सिस्टम और मानव संसाधन प्रबंधन फेल हो गया—तो यह सीधे-सीधे शासन की जिम्मेदारी बनती है।
जनसत्ता की रिपोर्ट बताती है कि यात्रियों की हालत बदतर थी—घंटों इंतज़ार, कोई सूचना नहीं, न सहायता, न विकल्प। कई यात्रियों ने कहा कि “हमारी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण दिन था… सरकार और सिस्टम की लापरवाही की वजह से सब बर्बाद हो गया।” मोदी सरकार जिस ‘कुशल प्रबंधन’ का दावा करती है, वह एयरपोर्ट जैसे बुनियादी ढांचे पर भी असरकारक नहीं दिख रहा।
मोदी सरकार के दौर में यह पहली बार नहीं हुआ। कभी ट्रेनें घंटों लेट, कभी डिजिटल सर्विस ठप, कभी वीज़ा–पासपोर्ट व्यवस्था ध्वस्त, कभी अस्पतालों में भीड़ और किल्लत—हर जगह एक जैसा दृश्य मिलता है। और अब हवाई सेवाएँ भी इसी अव्यवस्थापन की शिकार हो चुकी हैं। मोदी के “नए भारत” की तस्वीर चमकीली जरूर दिखाई जाती है, लेकिन हकीकत यह है कि आम आदमी की रोजमर्रा की जरूरतें सरकार की नीतिगत असफलताओं की भेंट चढ़ रही हैं।
लोग आज सवाल पूछ रहे हैं—क्या विकास सिर्फ बड़े मंचों के भाषणों और विदेश दौरों में दिखाई देता है? क्या आम नागरिक की परेशानी का कोई मूल्य नहीं? जब कोई यात्री अपनी मां के अस्पताल में भर्ती होने पर भी उड़ान न मिलने के कारण समय पर नहीं पहुंच पाता, तो यह सिर्फ इंडिगो की नहीं, बल्कि शासन की एक बड़ी विफलता होती है।
आने वाले समय में यह संकट और बढ़ सकता है, क्योंकि सरकार ने अब तक ऐसी घटनाओं के मूल कारणों पर ध्यान देने के बजाय केवल “उपचारात्मक बयानबाज़ी” की है। एयरपोर्ट पर यात्रियों का गुस्सा, उनका असहायपन और व्यवस्था से टूटता भरोसा ये सभी संकेत हैं कि देश की बुनियादी सेवाएँ खोखले दावों के भार से दब चुकी हैं।
आज जरूरत है कि सरकार दावे नहीं, जमीनी समाधान दे—वरना किसी की मां अस्पताल में होगी, किसी का करियर फिर दांव पर होगा, और आम आदमी इसी अव्यवस्थित सिस्टम के बीच हर रोज़ संघर्ष करता रहेगा।




