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AI से उत्पन्न ‘फर्जी फैसले’ न्यायिक व्यवस्था के लिए खतरा: सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति बिंदल की चेतावनी

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सीनियर वकीलों से अपील — युवा अधिवक्ताओं को दें डिजिटल विवेक और विधिक अनुशासन का मार्गदर्शन

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने न्यायिक प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते, लेकिन अविवेकपूर्ण प्रयोग को लेकर गहरी चिंता जताते हुए इसे न्याय व्यवस्था के लिए “खतरे की घंटी” करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि युवा अधिवक्ता अदालतों में AI द्वारा जनित भ्रामक और कभी-कभी पूरी तरह से फर्जी फैसलों का हवाला दे रहे हैं, जिससे न्याय की विश्वसनीयता और मर्यादा दोनों पर सवाल उठते हैं।

ऑल इंडिया सीनियर लॉयर्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित एक सम्मान समारोह में बोलते हुए न्यायमूर्ति बिंदल ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं से आग्रह किया कि वे AI के अंधाधुंध प्रयोग के दुष्परिणामों से युवाओं को अवगत कराएं और उन्हें तकनीकी विवेक, नैतिकता व विधिक शोध की बारीकियों में प्रशिक्षित करें।

न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने कहा कि AI मॉडल द्वारा दिए गए निर्णय कभी-कभी वास्तविक प्रतीत होते हैं, लेकिन प्रायः वे या तो अल्पमत राय पर आधारित होते हैं, या पूरी तरह से गढ़े गए होते हैं। इन्हें बिना जांच के अदालत में प्रस्तुत करना एक खतरनाक प्रवृत्ति बनता जा रहा है।

वरिष्ठ अधिवक्ता बनें ‘विधिक विवेक के दीपस्तंभ’

न्यायमूर्ति बिंदल ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया की सफलता में जूनियर और सीनियर वकीलों की भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश भले ही अंतिम निर्णय सुनाते हैं, लेकिन उनकी बुनियाद गहन शोध और सटीक तर्कों पर टिकी होती है — जो अधिवक्ताओं द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं। ऐसे में वरिष्ठ अधिवक्ताओं की यह नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि वे युवाओं को गहराई से सोचने, जांचने और समझने की संस्कृति दें।

सम्मान समारोह में सुप्रीम कोर्ट के नए न्यायाधीशों का अभिनंदन

इस अवसर पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किए गए चार न्यायाधीश — न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची, निलय वी. अंजारिया, विजय बिश्नोई और अतुल एस. चंदुरकर — को सम्मानित किया गया। न्यायमूर्ति पी.बी. वराले ने उनके योगदान की सराहना करते हुए न्यायिक परंपराओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की प्रशंसा की।

न्यायमूर्ति बागची ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं को “बरगद के वृक्ष” की उपमा देते हुए कहा कि उनकी छाया में संविधान और विधिशासन का वृक्ष फलता-फूलता है।

न्यायमूर्ति अंजारिया ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बनना सिर्फ पद नहीं, एक संकल्प है — न्याय की सेवा का, समाज की जिम्मेदारी का।”

न्यायमूर्ति बिश्नोई ने ज़ोर दिया कि व्यक्ति नहीं, संस्था शाश्वत होती है, और न्यायपालिका की प्रतिष्ठा निरंतर अनुशासन और आचरण से ही बनी रहती है।

न्यायमूर्ति चंदुरकर ने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता मित्र, मार्गदर्शक और विचारशील गुरु के समान हैं, जो न्याय को संविधान से व्यवहार में लाने की प्रक्रिया में मार्गदर्शन करते हैं।

AI के इस्तेमाल पर देशभर में हो रहा पुनर्विचार

न्यायमूर्ति बिंदल की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब हाल ही में केरल हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों को ChatGPT जैसे AI टूल्स से आदेश ड्राफ्ट करने से बचने की सलाह दी थी। अदालत ने कहा था कि बिना समुचित प्रशिक्षण के AI का प्रयोग न्यायिक गुणवत्ता और जवाबदेही दोनों पर असर डाल सकता है — यह भारत की न्यायिक प्रणाली में AI पर दी गई पहली औपचारिक चेतावनी मानी जा रही है।

वरिष्ठ विधिज्ञों का विश्वास और सुझाव

इस अवसर पर इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ जुरिस्ट्स (लंदन) के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. आदीश सी. अग्रवाला ने भारतीय न्यायपालिका की निष्पक्षता, कार्यक्षमता और संवेदनशीलता की सराहना की। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट दुनिया के सबसे भरोसेमंद न्यायालयों में गिना जाता है, और इसकी पहचान वैश्विक स्तर पर एक “न्याय की आशा” के रूप में है।

राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन ने समारोह में जानकारी दी कि उन्होंने न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने हेतु एक निजी विधेयक संसद में प्रस्तुत किया है, जो न्यायिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

ओडिशा के महाधिवक्ता पितांबर आचार्य ने न्यायपालिका की गरिमा और नव नियुक्त न्यायाधीशों की भूमिका को देश की विधिक विरासत के लिए सशक्त स्तंभ बताया।

तकनीक, न्याय और विवेक

जैसे-जैसे न्यायिक प्रक्रिया तकनीकी परिवर्तन के दौर में प्रवेश कर रही है, न्यायमूर्ति बिंदल की चेतावनी यह याद दिलाती है कि AI तकनीक एक उपकरण है — निर्णयकर्ता नहीं। कानून का हृदय नैतिक विवेक, तथ्य की परख, और संवेदनशील दृष्टिकोण में बसता है।

भविष्य की न्यायपालिका को तकनीकी रूप से सक्षम बनाने के साथ-साथ उसे नैतिक, विवेकशील और परंपराओं के प्रति सजग भी बनाना होगा — तभी न्याय वास्तविक और विश्वसनीय बन सकेगा।

 

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