महेंद्र सिंह । नई दिल्ली 3 दिसंबर 2025
प्रेस स्वतंत्रता पर नज़र रखने वाले प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) ने अपनी नवीनतम ‘प्रेस फ्रीडम प्रीडेटर्स’ सूची जारी की है, और इसमें भारत से दो प्रमुख नाम—अडानी समूह और दक्षिणपंथी वेबसाइट ऑपइंडिया—को शामिल किए जाने के बाद एक बड़ी राजनीतिक और मीडिया हलचल खड़ी हो गई है। यह सूची उन व्यक्तियों, संस्थानों और संगठनों को चिह्नित करती है जिन्हें पत्रकारिता की आज़ादी, स्वतंत्र रिपोर्टिंग और खोजी पत्रकारिता के लिए ख़तरा माना जाता है। भारत जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब किसी भारतीय कॉरपोरेट समूह और मीडिया संस्था को इस श्रेणी में रखा जाता है, तो यह न सिर्फ देश की वैश्विक छवि पर असर डालता है बल्कि मीडिया की विश्वसनीयता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
RSF की रिपोर्ट के अनुसार अडानी समूह पर आरोप है कि NDTV सहित कई मीडिया संस्थानों के अधिग्रहण के बाद समूह ने मीडिया कवरेज पर असंतुलित नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की। रिपोर्ट में कहा गया है कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों पर असहमति जताने वाले पत्रकारों, संपादकों और रिपोर्टरों पर दबाव डाला गया, जिसके परिणामस्वरूप आलोचनात्मक रिपोर्टिंग में कमी दर्ज की गई। अंतरराष्ट्रीय संगठन ने इस बात पर भी चिंता जताई है कि मीडिया पर कॉर्पोरेट और राजनीतिक दोनों तरफ से दोहरा दबाव बढ़ रहा है, जिससे भारतीय लोकतंत्र में सूचना की आज़ादी सीमित होती जा रही है। रिपोर्ट का कहना है कि किसी एक निजी समूह के पास मीडिया प्लेटफॉर्म्स की बड़ी हिस्सेदारी होना पत्रकारों की स्वतंत्रता के लिए दीर्घकालिक खतरा है।
वहीं दूसरी ओर, दक्षिणपंथी वेबसाइट ऑपइंडिया को RSF ने ‘प्रोपेगेंडा, नफरत फैलाने वाले नैरेटिव और असहमति को निशाना बनाने’ के आरोपों के तहत सूची में डाला है। रिपोर्ट का दावा है कि यह वेबसाइट अक्सर आलोचक पत्रकारों, अल्पसंख्यक आवाज़ों और विपक्षी विचारों पर हमलावर लेख प्रकाशित करती है, जिससे एक ध्रुवीकृत और असुरक्षित मीडिया वातावरण बनता है। RSF ने इसे “टारगेटेड डिसइंफॉर्मेशन मशीनरी” करार दिया है, जिससे पत्रकारों पर ऑनलाइन हमले बढ़ते हैं और मुक्त आलोचना की जगह सिकुड़ती जाती है। यह भी कहा गया कि ऑपइंडिया की शैली और नैरेटिव लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करते हैं और तथ्य-आधारित पत्रकारिता को हाशिये पर धकेलते हैं।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की इन दो संस्थाओं का नाम ‘प्रेस फ्रीडम प्रीडेटर्स’ सूची में आना विपक्षी दलों और स्वतंत्र पत्रकारों के लिए सरकार पर सवाल उठाने का एक मौका बन गया है। विपक्ष का कहना है कि मोदी सरकार के तहत मीडिया पर दबाव, भय और नियंत्रण का माहौल गहराया है, और RSF की सूची इस दावे को और मजबूती देती है। दूसरी ओर भाजपा समर्थक और सरकार के करीबी लोग RSF की रिपोर्ट को पक्षपाती बताते हुए इसे “अंतरराष्ट्रीय लॉबी का भारत विरोधी अभियान” करार दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह रिपोर्ट भारत की प्रेस स्वतंत्रता की स्थिति को लेकर एक गंभीर चेतावनी है। पिछले कुछ वर्षों में भारत लगातार विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में फिसलता आया है और RSF की यह नई सूची इस गिरावट को और अधिक संस्थागत रूप से रेखांकित करती है। यदि देश की प्रतिष्ठित संस्थाओं पर दबाव, नियंत्रण और मीडिया अधिग्रहण के जरिए नैरेटिव तय करने के आरोप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने आते हैं, तो यह न सिर्फ लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चुनौती है बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की छवि और निवेश वातावरण पर भी असर डाल सकता है।
इस सूची के सामने आने के बाद यह बहस तेज हो गई है कि क्या भारत में पत्रकारिता अब सुरक्षित है? क्या तीसरी आवाज़—यानी असहमत या स्वतंत्र आवाज़—अब भी खुलकर बोल सकती है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या मीडिया का एक बड़ा हिस्सा व्यवसाय और सत्ता के गठजोड़ का शिकार हो चुका है? RSF ने अपने नोट में स्पष्ट कहा कि “प्रेस की आज़ादी किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ है—और जहां यह रीढ़ कमजोर होती है, वहां लोकतंत्र का शरीर ढहने में देर नहीं लगती।” इन प्रश्नों का उत्तर आने वाले समय में भारत की राजनीतिक दिशा, मीडिया की भूमिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती तय करेंगे।




