नई दिल्ली 31 अक्टूबर 2025
भारत का दुर्भाग्य यही है कि जब राष्ट्र को सबसे मज़बूत आवाज़ की ज़रूरत थी, तब उसे सबसे कमजोर प्रधानमंत्री मिला। आज स्थिति यह है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत पर टिप्पणी करते हैं, भारत के प्रधानमंत्री पर तंज कसते हैं, और दिल्ली से कोई जवाब नहीं आता। ट्रंप ने पिछले कुछ वर्षों में लगभग 60 बार भारत और प्रधानमंत्री मोदी का सार्वजनिक अपमान किया, लेकिन सत्ताधारी व्यवस्था ने एक बार भी उस पर सख्त प्रतिक्रिया नहीं दी। यह चुप्पी अब केवल चुप्पी नहीं, बल्कि कायरता का प्रतीक बन चुकी है।
अब खबरें आ रही हैं कि भारत और अमेरिका के बीच नई डील होने जा रही है — और यही बात ट्रंप के अपमानजनक बयानों को सही ठहराती है। क्योंकि यदि ट्रंप बार-बार भारत को नीचा दिखा रहे हैं और भारत सरकार फिर भी अमेरिकी हितों के अनुरूप नीतियाँ बना रही है, तो सवाल उठता है — क्या अब भारत की विदेश नीति व्हाइट हाउस से तय हो रही है?
देखिए घटनाओं का सिलसिला — पहले अमेरिका के दबाव में रूस से सस्ता तेल खरीदना रोका गया, फिर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसा सैन्य सहयोग रोका गया, और अब अमेरिकी डील के नाम पर राष्ट्रीय नीतियों में समझौता हो रहा है। ये सब कुछ किसी स्वतंत्र राष्ट्र की नीति नहीं, बल्कि एक डरपोक नेतृत्व की गुलाम मानसिकता का परिणाम है।
भारत का इतिहास गवाह है — जब नेतृत्व मज़बूत होता है, तो दुनिया भारत की तरफ़ देखती है। लेकिन जब प्रधानमंत्री कमजोर पड़ जाता है, तो देश की आवाज़ भी खो जाती है। आज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की गरिमा कमज़ोर पड़ रही है, और दुनिया देख रही है कि कैसे एक नेता की चुप्पी पूरी सभ्यता की ताक़त को बौना बना रही है।
ट्रंप बोलते हैं — और मोदी चुप रहते हैं। ट्रंप नीचा दिखाते हैं — और मोदी मुस्कुराते हैं। ट्रंप तय करते हैं कि भारत कौन-सा तेल खरीदेगा, कौन-सा अभियान रोकेगा, कौन-सी डील साइन करेगा। क्या यह वही भारत है जिसे विश्वगुरु बनने का सपना दिखाया गया था?
यह लिजलिजा नेतृत्व देश की आत्मा को चोट पहुँचा रहा है। एक राष्ट्र, जो कभी “नेहरू की गुटनिरपेक्षता” और “इंदिरा की निर्भीकता” के लिए जाना जाता था, आज डर और चुप्पी की नीति में सिमट गया है। यह वही भारत है जो कभी “न झुकेगा, न रुकेगा” कहता था — और अब “जो ट्रंप बोलेगा, वही होगा” की राह पर चल पड़ा है।
देश को आज जवाब चाहिए — ट्रंप के अपमान का नहीं, बल्कि मोदी की चुप्पी का। क्योंकि जब प्रधानमंत्री कमजोर होता है, तो देश की आवाज़ भी कमजोर पड़ जाती है — और आज वही हो रहा है।




