शशि भूषण | रांची, 23 दिसंबर 2025
झारखंड के आदिवासी समाज के लिए यह दिन सिर्फ एक सरकारी फैसले का नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों की बहाली और स्वशासन के सपने के पूरा होने का दिन बन गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई राज्य कैबिनेट की बैठक में आखिरकार PESA (पंचायती राज – अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) नियमावली 2025 को मंजूरी दे दी गई। यह वही कानून है, जिसका इंतजार झारखंड के आदिवासी समुदाय पिछले पच्चीस वर्षों से कर रहे थे।
PESA एक्ट वर्ष 1996 में केंद्र सरकार ने इसलिए बनाया था ताकि पांचवीं अनुसूची वाले आदिवासी बहुल इलाकों में ग्राम सभा को सर्वोच्च ताकत दी जा सके। इसका मूल भाव साफ था—आदिवासी अपने जल, जंगल और जमीन के मालिक खुद हों, उनके गांव का फैसला दिल्ली या रांची नहीं, बल्कि गांव की चौपाल में बैठे लोग करें। लेकिन झारखंड के अलग राज्य बनने (2000) के बाद भी यह कानून सिर्फ कागजों में जिंदा रहा, क्योंकि राज्य स्तर पर इसकी नियमावली ही नहीं बनी। अब, एक लंबे संघर्ष और इंतजार के बाद, यह ऐतिहासिक कमी दूर हुई है।
कैबिनेट की मंजूरी के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि यह नियमावली विभिन्न विभागों, विशेषज्ञों और आदिवासी हितधारकों से व्यापक विचार-विमर्श के बाद तैयार की गई है। उनका कहना था कि यह नियम केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की परंपराओं और स्वाभिमान की रक्षा का औजार है। कैबिनेट सचिव वंदना डाडेल ने भी स्पष्ट किया कि PESA एक्ट के सभी जरूरी प्रावधानों को नियमावली में शामिल किया गया है, ताकि इसे जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।
अब गांव तय करेंगे अपना भविष्य
इस फैसले के बाद झारखंड के अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की भूमिका पूरी तरह बदल जाएगी। अब ग्राम सभा सिर्फ औपचारिक बैठक भर नहीं रहेगी, बल्कि विकास से जुड़े बड़े फैसलों की असली मालिक होगी। लघु वन उत्पादों का उपयोग, पानी के स्रोतों का संरक्षण, गांव की विकास योजनाएं, भूमि अधिग्रहण, खनन परियोजनाएं—इन सब पर ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य होगी। मतलब साफ है, अब बिना गांव की मंजूरी के कोई कंपनी, कोई ठेकेदार और कोई विभाग आदिवासी इलाकों में मनमानी नहीं कर पाएगा।
सबसे अहम बात यह है कि इस नियमावली के जरिए आदिवासियों की पारंपरिक शासन व्यवस्था को कानूनी मान्यता मिली है। गांव अपने रीति-रिवाजों, परंपराओं और सामाजिक नियमों के अनुसार खुद को संचालित कर सकेंगे। यह फैसला आधुनिक कानून और आदिवासी परंपरा के बीच एक मजबूत सेतु बनकर उभरा है।
झारखंड के किन इलाकों में लागू होगा PESA?
झारखंड के 24 जिलों में से 13 जिले पूरी तरह अनुसूचित क्षेत्र में आते हैं, जबकि दो जिलों के कुछ हिस्से भी पांचवीं अनुसूची के तहत शामिल हैं। यानी कुल मिलाकर 15 जिलों के लाखों आदिवासी परिवारों के जीवन पर इस फैसले का सीधा असर पड़ेगा। जिन इलाकों में दशकों से खनन, जमीन अधिग्रहण और संसाधनों के दोहन को लेकर संघर्ष चलता रहा है, वहां अब ग्राम सभा की आवाज सबसे ऊपर होगी।
हाईकोर्ट की सख्ती ने भी निभाई भूमिका
यह फैसला यूं ही नहीं आया। झारखंड हाईकोर्ट ने PESA लागू न होने पर सरकार से सख्त सवाल किए थे। सितंबर 2025 में कोर्ट ने इसी आधार पर अनुसूचित क्षेत्रों में बालू खदानों की नीलामी पर रोक लगा दी थी और सरकार को जल्द नियम बनाने का निर्देश दिया था। अब नियमावली को अधिसूचित करते ही PESA कानून पूरी तरह प्रभावी हो जाएगा और कोर्ट के आदेश का पालन भी सुनिश्चित होगा।
राजनीतिक सहमति, सामाजिक संतोष
इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत सिर्फ सत्तारूढ़ गठबंधन ने ही नहीं, बल्कि विपक्ष ने भी किया है। भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने इसे आदिवासियों के हित में सही कदम बताया, वहीं कांग्रेस समेत कई आदिवासी संगठनों ने कहा कि यह फैसला देरी से सही, लेकिन जरूरी था। वर्षों से आंदोलन कर रहे आदिवासी संगठनों के लिए यह एक बड़ी नैतिक जीत मानी जा रही है।
निष्कर्ष: कागज से जमीन तक का सफर
PESA नियमावली की मंजूरी झारखंड के आदिवासी समाज के लिए केवल एक कानूनी उपलब्धि नहीं, बल्कि स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और अधिकारों की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। अब असली चुनौती इसके ईमानदार और प्रभावी क्रियान्वयन की होगी। अगर ग्राम सभाओं को सही मायने में ताकत मिली, तो यह कानून झारखंड के आदिवासी इलाकों में विकास और संरक्षण के बीच संतुलन का नया मॉडल पेश कर सकता है।
23 दिसंबर 2025 झारखंड के आदिवासी इतिहास में एक यादगार तारीख के रूप में दर्ज हो गया है—जब गांव को उसका हक वापस मिला और जल-जंगल-जमीन पर मालिकाना फिर से आदिवासियों के हाथ आया।




