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महंगाई–बेरोज़गारी से कराहता देश, संसद में ‘वंदे मातरम्’ बहस—आम आदमी पूछ रहा: रोटी–रोज़गार पर कब होगी चर्चा?

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आलोक कुमार । नई दिल्ली 7 दिसंबर 2025

देश की सड़कों, गलियों और गांवों में आज सबसे बड़ी बहस बेरोज़गारी और महंगाई की है। आम आदमी के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना दिन–प्रतिदिन मुश्किल होता जा रहा है। नौजवान डिग्री लेकर घरों में बैठे हैं, रोजगार के अवसर सिकुड़ रहे हैं और महंगाई घर के बजट को तोड़ रही है। राशन, बिजली, गैस, किराया, दवाई—हर चीज़ आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही है। स्थिति यह है कि आधा देश सरकारी 5 किलो राशन के भरोसे जिंदगी गुजार रहा है। ऐसे में जनता का सवाल बिल्कुल सीधा है—जब पेट खाली है, जेब खाली है, तब विकास के दावे किसके लिए हैं?

शिक्षा का खर्च भी लगातार बढ़ रहा है। प्राइवेट स्कूलों और विश्वविद्यालयों की फीस आसमान छू रही है, और सरकारी संस्थान संसाधनों के अभाव से जूझ रहे हैं। माता–पिता बच्चों की पढ़ाई को लेकर कर्ज़ में डूब रहे हैं। युवा कह रहे हैं कि डिग्री लेकर भी नौकरी नहीं, और नौकरी मिले भी तो वेतन इतना कम कि भविष्य सुरक्षित करना तो दूर, आज का खर्च निकालना भी चुनौती बन गया है।

इन आर्थिक दबावों के बीच जनता और विपक्ष का यह आरोप तेज हो गया है कि देश के बड़े–बड़े प्रोजेक्ट, बंदरगाह, एयरपोर्ट, खदानें, इंफ्रास्ट्रक्चर—सब कुछ कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों को सौंपा जा रहा है। आलोचक कहते हैं कि भ्रष्टाचार अब फाइलों में नहीं, नीतियों में दिखता है—जहां सरकारी नीतियों का झुकाव एकतरफा होता हुआ नजर आता है। छोटे व्यापारी और मध्यम उद्योग बंद हो रहे हैं, लेकिन बड़े घरानों का विस्तार जारी है। लोग तंज कसते हैं कि देश की पूंजी अब जनता के हाथ में नहीं, बल्कि सत्ता के ‘दोस्तों’ के हवाले होती जा रही है।

उधर, चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी सवाल गहराते जा रहे हैं। विपक्ष दावा कर रहा है कि चुनाव आयोग सरकार के दबाव में काम कर रहा है, और SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) के नाम पर मतदाता सूचियों में मनमानी की जा रही है। कई चुनावी नतीजों को लेकर विपक्ष ने आरोप लगाया है कि सत्ता पक्ष प्रशासन का गलत इस्तेमाल कर रहा है और “एक के बाद एक चुनाव चोरी कर जीता जा रहा है।” लोगों के मन में लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को लेकर चिंता बढ़ी है।

इन्हीं परिस्थितियों में संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार ने वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर 10 घंटे की लंबी बहस तय की है। प्रधानमंत्री मोदी 8 दिसंबर को लोकसभा में इस बहस की शुरुआत करेंगे, जबकि राज्यसभा में 9 दिसंबर को गृह मंत्री अमित शाह चर्चा प्रारंभ करेंगे। सरकार इसे राष्ट्रभावना और ऐतिहासिक महत्व से जुड़े बड़े आयोजन की तरह पेश कर रही है।

लेकिन इस बीच जनता के मन में एक और तीखी टिप्पणी उठ रही है—कि “नॉन-इश्यू को इश्यू बनाने वाले नॉन-बायोलॉजिकल एंटायर पॉलिटिकल साइंस के ज्ञाता को समझना चाहिए कि आधा देश जहाँ 5 किलो राशन के भरोसे जी रहा है, वहाँ कुछ कंस्ट्रक्टिव और पॉजिटिव काम करना चाहिए।” यह टिप्पणी उस भावना को व्यक्त करती है कि प्रतीक, नारे और विवाद खड़े करने से पहले देश की जमीनी समस्याओं—रोज़गार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और किसानों की हालत—पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

विपक्ष भी यही सवाल उठा रहा है कि जब देश आर्थिक संकट और सामाजिक तनाव से जूझ रहा है, तो क्या संसद में बेरोज़गारी व महंगाई पर भी दस घंटे की बहस होगी? क्या प्रधानमंत्री सीधे जवाब देंगे कि युवा नौकरी के लिए कब तक इंतजार करें? क्या महंगे इलाज, महंगी शिक्षा, गिरते व्यवसाय और कमजोर होती संस्थाओं पर भी समान गंभीरता दिखाई जाएगी?

आम आदमी यही चाहता है कि संसद में बहसें सिर्फ़ भावनाओं और प्रतीकों पर नहीं, बल्कि उसकी रसोई, उसके भविष्य और उसके अधिकारों पर हों। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब संसद की गूंज उन घरों तक पहुँचे जहाँ महीने के अंत में पैसे खत्म हो जाते हैं, और जहाँ लोग पांच किलो राशन पर टिकी जिंदगी को ‘अमृतकाल’ मानने को मजबूर हैं।

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