नई दिल्ली 5 अक्टूबर 2025
अमेरिका में हाल ही में सामने आई एक किशोरी की “हिप पेन से कैंसर” वाली कहानी ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया, लेकिन भारत में यह कहानी कोई दुर्लभ उदाहरण नहीं है। यहाँ, हज़ारों किशोर हर साल इसी तरह की चुपचाप बढ़ती बीमारियों के शिकार होते हैं — जिनकी शुरुआत एक साधारण दर्द या सूजन से होती है, लेकिन अंत अक्सर अस्पताल के कैंसर वार्ड में होता है।
हड्डी का कैंसर (Bone Cancer), खासतौर पर Ewing Sarcoma और Osteosarcoma, भारत में किशोरों के बीच तेजी से उभर रहा है। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक “खामोश महामारी” बन चुका है — क्योंकि इसके लक्षण साधारण होते हैं, निदान देर से होता है, और इलाज बेहद महंगा है।
ज्यादातर मामलों में यह बीमारी उन बच्चों या किशोरों में पाई जाती है जो बेहद सक्रिय रहते हैं — खेलते हैं, दौड़ते हैं, और अक्सर किसी चोट के बाद दर्द की शिकायत करते हैं। परिवार इसे सामान्य समझकर टाल देते हैं, लेकिन धीरे-धीरे वही दर्द जीवन के लिए खतरा बन जाता है।
भारत की हकीकत — आंकड़े बताते हैं डरावनी तस्वीर
भारत में बोन कैंसर के आधिकारिक आंकड़े सीमित हैं, लेकिन प्रमुख चिकित्सा संस्थानों के शोध बताते हैं कि हर साल लगभग 3,500 से 4,000 किशोर इस बीमारी से ग्रस्त पाए जाते हैं।
दिल्ली के AIIMS, मुंबई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, और चेन्नई के कैंसर इंस्टिट्यूट अडयार की रिपोर्टों के अनुसार, 60% से अधिक मामलों में बीमारी का पता तीसरे या चौथे चरण में चलता है, जब यह हड्डियों से आगे फेफड़ों या रीढ़ तक फैल चुकी होती है।
ग्रामीण भारत में तो स्थिति और भयावह है। वहां के डॉक्टर और परिजन अक्सर दर्द को पोषण की कमी, खेल की चोट या गठिया मान लेते हैं।
झारखंड, बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कैंसर का निदान औसतन तीन से पाँच महीने की देरी से होता है — और यह देरी ही अक्सर जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी बन जाती है।
चिकित्सकीय चेतावनी — हर दर्द केवल दर्द नहीं होता
टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के वरिष्ठ ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अरविंद खन्ना कहते हैं, “भारत में हड्डी के कैंसर का सबसे बड़ा शत्रु है — अज्ञान और लापरवाही। हम दर्द को मामूली मानते हैं, जबकि वही दर्द शरीर का संकेत होता है कि भीतर कुछ गंभीर गड़बड़ है।”
डॉ. खन्ना बताते हैं कि बच्चों में बार-बार होने वाला दर्द, जो रात में बढ़ जाए, सूजन या हल्की बुखार जैसी स्थिति — ये सब शुरुआती संकेत हो सकते हैं। लेकिन भारत में इन संकेतों को अक्सर टाल दिया जाता है।
वे कहते हैं कि अगर हर जिले में बुनियादी एमआरआई और ब्लड टेस्ट सुविधाएँ हों, तो बोन कैंसर को शुरुआती चरण में पकड़ा जा सकता है और 70% मामलों में जान बचाई जा सकती है। हालांकि वास्तविकता यह है कि भारत में अधिकांश बच्चे कैंसर विशेषज्ञ तक तभी पहुँचते हैं, जब रोग आधा शरीर खा चुका होता है।
इलाज की लड़ाई — पैसे, पहुंच और समय की त्रासदी
भारत में बोन कैंसर का इलाज लंबा, जटिल और बेहद महंगा होता है। इलाज की लागत 5 से 15 लाख रुपये तक पहुँच सकती है, जो कि अधिकांश मध्यम और निम्न वर्गीय परिवारों के लिए असंभव है।
सरकारी अस्पतालों में उपचार नि:शुल्क या सस्ते दर पर उपलब्ध है, लेकिन वहाँ संसाधन सीमित हैं। AIIMS में औसतन एक मरीज को कीमोथेरेपी की बारी आने में दो से तीन महीने का समय लग जाता है।
ग्रामीण परिवारों के लिए यह देरी घातक साबित होती है।
पिछले वर्ष वाराणसी के एक 13 वर्षीय लड़के का मामला सामने आया था, जिसके पैर में लगातार दर्द था। परिवार ने गांव के झोलाछाप डॉक्टर से इलाज कराया, पर जब दिल्ली लाए तो पता चला कि कैंसर तीसरे चरण में पहुँच चुका था।
बचाव की संभावना लगभग समाप्त थी। यह कहानी अनगिनत भारतीय परिवारों की हकीकत है — जहां लापरवाही और गरीबी मिलकर बच्चों की जिंदगियां निगल जाती हैं।
ग्रामीण बनाम शहरी भारत — इलाज की असमानता
भारत के शहरी इलाकों में निजी अस्पतालों, एमआरआई मशीनों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता के कारण निदान अपेक्षाकृत जल्दी हो जाता है। लेकिन देश के 70% हिस्से, यानी ग्रामीण भारत में अब भी ऐसी सुविधाएँ सपने जैसी हैं। कई राज्यों में कैंसर जांच के लिए मरीजों को 200-300 किलोमीटर दूर तक यात्रा करनी पड़ती है।
इंडियन ऑर्थोपेडिक ऑन्कोलॉजी सोसाइटी की रिपोर्ट कहती है कि “भारत के गांवों में हड्डी का कैंसर आज भी अदृश्य बीमारी है — न डॉक्टरों को इसका प्रशिक्षण दिया जाता है, न जनता को चेतावनी।” यही वजह है कि ग्रामीण इलाकों में लगभग 80% मामले चौथे चरण में पहुँचने के बाद ही सामने आते हैं।
आशा की किरण — भारतीय डॉक्टरों की कोशिशें
इन कठिन हालात के बावजूद भारत में कई डॉक्टर और संस्थान उम्मीद की किरण जगा रहे हैं। दिल्ली के AIIMS में “पेडियाट्रिक बोन ट्यूमर क्लिनिक” शुरू किया गया है, जहां बच्चों के लिए एकीकृत इलाज — यानी सर्जरी, कीमोथेरेपी और रिहैबिलिटेशन — एक ही जगह मिलता है।
मुंबई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल और बेंगलुरु के किडवई कैंसर इंस्टिट्यूट में “लिंब-सेविंग सर्जरी” की आधुनिक तकनीकें अपनाई जा रही हैं, जिससे कैंसरग्रस्त हड्डी को निकालकर भी मरीज का पैर या हाथ बचाया जा सकता है।
डॉ. मनीष अग्रवाल, जो इस सर्जरी के विशेषज्ञ हैं, कहते हैं, “पहले हड्डी का कैंसर मतलब अंग काट देना होता था। अब तकनीक ने हमें इंसान का शरीर और आत्मविश्वास दोनों बचाने का मौका दिया है।”
नीति और समाज की भूमिका — जागरूकता ही उपचार है
भारत सरकार ने “राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम” (National Cancer Control Programme) के तहत कैंसर जांच और इलाज के लिए जिला स्तर पर केंद्र स्थापित करने की योजना बनाई है, लेकिन यह अभी शुरुआती अवस्था में है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को अब कैंसर को सिर्फ एक “बीमारी” नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में देखना चाहिए। अगर देश के स्कूलों और पंचायत स्तर पर कैंसर-जागरूकता अभियान शुरू किए जाएँ, तो हजारों बच्चों की ज़िंदगी बचाई जा सकती है।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. जे.ए. जयलाल कहते हैं, “भारत को सबसे पहले यह समझना होगा कि जागरूकता ही उपचार है। अगर हर मां-बाप को यह पता हो कि लगातार दर्द या सूजन कोई सामान्य बात नहीं है, तो आधे से अधिक बच्चे बच सकते हैं।”
दर्द की भाषा सुनना सीखिए, ज़िंदगी बदल जाएगी
भारत के अस्पतालों में हर साल ऐसे हजारों बच्चे भर्ती होते हैं, जिनकी ज़िंदगी एक छोटी सी लापरवाही से उलझ जाती है। उनकी कहानियाँ हमें एक सच्चाई सिखाती हैं — कि हर दर्द में एक चेतावनी छिपी होती है। किशोरों में बोन कैंसर को हराने के लिए सिर्फ दवा नहीं, समझ और संवेदना दोनों की जरूरत है। अगर देश अपने बच्चों को स्वस्थ भविष्य देना चाहता है, तो उसे “दर्द को गंभीरता से लेने की संस्कृति” विकसित करनी होगी। क्योंकि जैसा डॉक्टर कहते हैं — “हर दर्द सिर्फ दर्द नहीं होता, कभी-कभी वह जीवन का आखिरी संकेत होता है।”




