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कांग्रेस की भूख हड़ताल में सहयोगियों की गैरमौजूदगी, राज्य दर्जे की लड़ाई तेज

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श्रीनगर 10 अगस्त 2025

जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस ने राज्य का दर्जा बहाल कराने के लिए एक लंबा और प्रतीकात्मक आंदोलन शुरू किया है, जिसे उसने “हमारी रियासत, हमारा हक” नाम दिया है। यह आंदोलन केवल एक दिन का नहीं, बल्कि श्रृंखलाबद्ध भूख हड़तालों के रूप में 9 अगस्त से 20 अगस्त तक चलेगा। 15 और 16 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इसे रोका जाएगा, लेकिन बाक़ी दिनों में अलग-अलग जिलों और शहरों में कांग्रेस कार्यकर्ता और नेता बारी-बारी से अनशन पर बैठेंगे। इस पहल की शुरुआत 9 अगस्त को श्रीनगर से हुई, जहाँ जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस समिति (JKPCC) के अध्यक्ष तारिक हमीद कर्रा ने वरिष्ठ नेताओं और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं के साथ हिस्सा लिया। इस आंदोलन का उद्देश्य अनुच्छेद 370 हटाए जाने और राज्य के दो केंद्र शासित प्रदेशों में बंटने के छह साल बाद जनता को फिर से पूर्ण राज्य का अधिकार दिलाना है।

कांग्रेस का रुख स्पष्ट है—वह मानती है कि जम्मू-कश्मीर को अन्य राज्यों की तरह पूर्ण अधिकार और स्वायत्त शासन का दर्जा मिलना चाहिए, बिना किसी शर्त या समझौते के। इसी संदर्भ में 5 अगस्त को, जब अनुच्छेद 370 को हटाए जाने की छठी वर्षगांठ थी, कांग्रेस ने इसे ‘काला दिवस’ के रूप में मनाया। उस दिन जम्मू, श्रीनगर और सभी जिलों में शांतिपूर्ण धरने, विरोध रैलियां और जनसभाएं आयोजित की गईं। पार्टी नेताओं ने कहा कि जब तक राज्य का दर्जा बहाल नहीं होता, यह संघर्ष जारी रहेगा। इस अभियान में केवल धरना और अनशन ही नहीं, बल्कि व्यापक जनसंपर्क, नुक्कड़ सभाएं और चौक-चौराहों पर जनता के साथ संवाद भी शामिल हैं, ताकि लोगों में इस मुद्दे को लेकर जागरूकता फैलाई जा सके।

हालांकि, इस आंदोलन ने राजनीतिक हलकों में एक अलग ही बहस छेड़ दी है। कांग्रेस के प्रमुख सहयोगी दल नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) इसमें शामिल नहीं हुआ। NC के नेता और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि उन्हें इस भूख हड़ताल के बारे में पहले से कोई सूचना नहीं दी गई थी, न ही यह मुद्दा 19 जुलाई को हुई INDIA गठबंधन की बैठक में उठाया गया। उनका कहना था कि अगर कांग्रेस ने पहले चर्चा की होती, तो शायद NC इस आंदोलन का हिस्सा बनता। उमर अब्दुल्ला ने संसद के मौजूदा मानसून सत्र में राज्य का दर्जा बहाल होने की उम्मीद जताई, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि वे खुद इस भूख हड़ताल में शामिल नहीं होंगे। इस बयान ने यह संकेत भी दिया कि विपक्षी खेमे के भीतर आपसी संवाद और समन्वय की कमी अभी भी एक चुनौती है।

कांग्रेस के आंदोलन के बीच लद्दाख में भी समान मांगों के साथ आवाज़ उठ रही है। कारगिल में विभिन्न स्थानीय संगठनों ने तीन दिन की भूख हड़ताल शुरू की है, जिसमें राज्य-सदृश दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग की जा रही है। यह दर्शाता है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, दोनों ही क्षेत्रों में राजनीतिक अधिकारों और स्थानीय शासन को लेकर असंतोष गहराता जा रहा है। इस पृष्ठभूमि में कांग्रेस का आंदोलन केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि केंद्र-राज्य संबंधों और संघीय ढांचे पर एक व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकता है।

कुल मिलाकर, कांग्रेस ने जम्मू-कश्मीर में राज्य के दर्जे की बहाली के मुद्दे पर विपक्षी राजनीति में एक नई सक्रियता लाई है, लेकिन सहयोगी दलों की अनुपस्थिति ने इस आंदोलन के संदेश और ताकत पर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह अभियान जनता में पर्याप्त समर्थन जुटा पाता है और क्या विपक्षी दल आपसी मतभेदों को किनारे रखकर एक साझा रणनीति बना पाते हैं, या यह आंदोलन भी केवल एक राजनीतिक प्रतीक बनकर रह जाएगा।

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