नई दिल्ली | 28 जुलाई 2025 – बिहार में विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट किया कि वह 1 अगस्त को प्रकाशित होने वाली ड्राफ्ट मतदाता सूची को रोकने का अंतरिम आदेश नहीं देगा। अदालत ने इस मामले में 29 जुलाई को अंतिम सुनवाई की समयसीमा तय करने का संकेत दिया है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह सूची केवल ड्राफ्ट (प्रारूप) है और इसका सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। पीठ ने यह भी कहा कि पिछली सुनवाई में याचिकाकर्ताओं ने अंतरिम राहत की मांग नहीं की थी, इसलिए अब वह आदेश नहीं दिया जा सकता।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता संकरणारायणन ने कहा कि करीब 4.5 करोड़ लोग पहचान प्रमाण के अभाव में मतदान से वंचित हो सकते हैं। इस पर कोर्ट ने चुनाव आयोग के हलफनामे का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि 2003 में जिन मतदाताओं के नाम सूची में दर्ज थे, उन्हें फिर से दस्तावेज़ जमा करने की जरूरत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र को प्रामाणिक दस्तावेज़ मानते हुए नामांकन प्रक्रिया में शामिल करता रहे, क्योंकि ये दस्तावेज़ “प्रामाणिकता की धारणा” रखते हैं।
इस मुद्दे पर राज्य भर में विपक्षी दलों द्वारा विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। कांग्रेस, राजद और सपा समेत अन्य विपक्षी नेताओं ने इस प्रक्रिया को जनविरोधी और असंवैधानिक बताते हुए इसे रोकने की मांग की है।
बिहार में मतदाता सूची के इस विशेष गहन पुनरीक्षण पर कई संगठनों और नागरिक मंचों ने भारी अनियमितताओं और व्यावहारिक कठिनाइयों का आरोप लगाया है। पटना में हुई एक जनसुनवाई के बाद नागरिक पैनल ने रिपोर्ट में इस प्रक्रिया को “अव्यवहारिक” करार दिया था।
अब इस संवेदनशील मामले पर सुप्रीम कोर्ट की अंतिम सुनवाई के कार्यक्रम का सबको इंतजार है, जिससे यह तय हो सके कि बिहार में चुनावी प्रक्रिया न्यायसंगत, पारदर्शी और समावेशी होगी या नहीं।




