[the_ad id="179"]
Home » International » ‘ब्राउन हिंदू’ से ब्रिटिश पहचान तक, Rishi Sunak ने छेड़ी नस्ल, धर्म और प्रवास पर बड़ी बहस

‘ब्राउन हिंदू’ से ब्रिटिश पहचान तक, Rishi Sunak ने छेड़ी नस्ल, धर्म और प्रवास पर बड़ी बहस

अंतरराष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | लंदन | 21 सितंबर 2026

ब्रिटेन की राजनीति में एक बार फिर नस्ल, पहचान और प्रवास का सवाल चर्चा के केंद्र में है। पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री Rishi Sunak ने अपने एक लेख में चेतावनी दी है कि किसी व्यक्ति की त्वचा के रंग को उसकी ब्रिटिश या अंग्रेज पहचान का पैमाना नहीं बनाया जाना चाहिए। Sunak ने यह बात ऐसे समय कही है जब ब्रिटेन में आव्रजन और राष्ट्रीय पहचान को लेकर बहस लगातार तेज बनी हुई है।

The Sunday Times में लिखे अपने कॉलम में Sunak ने अपने ही अनुभव को इस बहस से जोड़ा। उन्होंने अपनी पहचान को अंग्रेज और हिंदू, दोनों रूपों में सामने रखा और सवाल उठाया कि क्या गैर-श्वेत लोगों को उनकी त्वचा के रंग के आधार पर कम ब्रिटिश या कम अंग्रेज माना जा सकता है।

Sunak का यह बयान उनके व्यक्तिगत अनुभव के कारण भी खास है। वह भारतीय मूल के ऐसे पहले ब्रिटिश राजनेता हैं जो 10 Downing Street तक पहुंचे और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने। इसलिए जब वह ब्रिटिश पहचान और नस्ल के रिश्ते पर बात करते हैं, तो बहस सिर्फ सैद्धांतिक नहीं रह जाती, बल्कि उनकी अपनी सार्वजनिक और राजनीतिक यात्रा भी उसके साथ जुड़ जाती है।

उन्होंने ब्रिटेन में पहचान को लेकर पुराने ‘Tebbit test’ का भी संदर्भ दिया। यह नाम 1990 के दशक में ब्रिटेन के तत्कालीन कंजर्वेटिव सांसद Norman Tebbit की उस टिप्पणी से जुड़ा है जिसमें अप्रवासी समुदायों की निष्ठा को लेकर यह सवाल उठाया गया था कि वे इंग्लैंड की क्रिकेट टीम के बजाय अपने मूल देश की टीम का समर्थन करते हैं या नहीं। Sunak ने इसी पुराने संदर्भ को आज की ब्रिटिश पहचान की बहस से जोड़ते हुए त्वचा के रंग और राष्ट्रीयता के बीच संबंध बनाने को लेकर चेताया।

यह बहस ऐसे समय सामने आई है जब ब्रिटेन में आव्रजन लंबे समय से राजनीतिक चर्चा का बड़ा मुद्दा बना हुआ है। प्रवासियों की संख्या, सीमा नियंत्रण, नागरिकता, सांस्कृतिक पहचान और ब्रिटिश मूल्यों को लेकर अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण मौजूद हैं। Sunak के ताजा लेख ने इसी व्यापक बहस में नस्ल और पहचान के सवाल को फिर सामने ला दिया है।

Sunak ने हाल में Marylebone Cricket Club यानी MCC के Cowdrey Lecture में भी क्रिकेट को समाज को जोड़ने वाली ताकत के रूप में पेश किया था। उन्होंने खेल को व्यापक रूप से और खास तौर पर क्रिकेट को लोगों के बीच साझा पहचान बनाने वाली गतिविधि बताया था। अब उनके लेख में पहचान और नस्ल को लेकर उठाए गए सवालों को उसी व्यापक विचार से जोड़कर देखा जा रहा है।

Sunak की कहानी ब्रिटेन के बदलते सामाजिक ढांचे की भी एक झलक देती है। भारतीय मूल का एक व्यक्ति ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनता है, संसद में शीर्ष राजनीतिक पद तक पहुंचता है और फिर ब्रिटिश पहचान की परिभाषा पर सार्वजनिक बहस में अपने अनुभव को सामने रखता है। यही कारण है कि उनके बयान ने केवल आव्रजन नीति की बहस नहीं, बल्कि इस सवाल को भी चर्चा में ला दिया है कि आधुनिक ब्रिटेन में ‘ब्रिटिश’ होने का अर्थ आखिर क्या है।

इस पूरे विवाद में एक तरफ राष्ट्रीय पहचान और आव्रजन नियंत्रण को लेकर चिंताएं हैं, तो दूसरी तरफ यह सवाल है कि क्या ब्रिटिश पहचान को नस्ल, त्वचा के रंग या पारिवारिक मूल से जोड़ा जाना चाहिए। Sunak का तर्क इसी दूसरे सवाल पर केंद्रित है। उनका कहना है कि किसी व्यक्ति की त्वचा का रंग यह तय करने का आधार नहीं होना चाहिए कि वह ब्रिटिश या अंग्रेज है या नहीं।

Rishi Sunak का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बहस केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री की निजी पहचान तक सीमित नहीं है। यह उस बड़े सवाल को सामने लाता है जो आज कई बहुसांस्कृतिक समाजों के सामने है—क्या राष्ट्रीय पहचान जन्म, त्वचा के रंग और पारिवारिक मूल से तय होगी, या नागरिकता, साझा मूल्यों और समाज में भागीदारी से? ब्रिटेन में आव्रजन पर राजनीतिक बहस आगे बढ़ते हुए यह सवाल आने वाले समय में भी चर्चा के केंद्र में रहने की संभावना रखता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *