बिजनेस/ कॉरपोरेट | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 21 सितंबर 2026
Tata समूह की चमकदार कॉरपोरेट दुनिया के पीछे एक ऐसी कानूनी लड़ाई फिर सामने आ गई है, जिसकी जड़ें करीब पांच साल पुराने सुप्रीम कोर्ट के फैसले में छिपी हैं। सवाल N Chandrasekaran की दोबारा नियुक्ति का है, लेकिन बहस सिर्फ एक चेयरमैन की कुर्सी तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि Tata Sons में अंतिम निर्णय की ताकत किसके पास है—बोर्ड के बहुमत के पास या Tata Trusts के विशेष वोटिंग अधिकारों के पास?
मामला तब गरम हुआ जब 17 सितंबर को Tata Sons के बोर्ड ने N Chandrasekaran को कार्यकारी चेयरमैन के रूप में अगले पांच साल के लिए दोबारा नियुक्त करने का फैसला किया। इसके बाद Tata Trusts ने इस फैसले की वैधता पर सवाल उठाया। Trusts का कहना है कि Tata Sons के Articles of Association में कुछ महत्वपूर्ण फैसलों के लिए उनके नामित निदेशकों की सकारात्मक सहमति जरूरी है। यानी मामला सिर्फ यह नहीं है कि बोर्ड ने कितने वोटों से फैसला किया, बल्कि यह भी है कि क्या कुछ मामलों में सामान्य बहुमत से आगे बढ़ने के लिए विशेष सहमति अनिवार्य है।
यहीं से कहानी पहुंचती है 2021 के उस सुप्रीम कोर्ट फैसले तक, जिसने Cyrus Mistry और Tata Sons के बीच चले लंबे विवाद का निपटारा किया था। उस फैसले में अदालत ने Tata Trusts से जुड़े Tata Sons के Articles of Association के विशेष प्रावधानों को बरकरार रखा था। अब Tata Trusts की ओर से वरिष्ठ वकील Abhishek Manu Singhvi ने इसी फैसले का हवाला देते हुए कहा है कि अदालत ने Tata Sons के साथ Trusts के संबंधों में उनकी विशेष भूमिका को स्पष्ट रूप से मान्यता दी थी।
Tata Trusts की ताकत को समझने के लिए एक आंकड़ा काफी है। Trusts के पास सामूहिक रूप से Tata Sons की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। लेकिन मौजूदा विवाद की दिलचस्पी सिर्फ इतनी बड़ी हिस्सेदारी में नहीं है। असली पेच उन विशेष अधिकारों का है जो Tata Sons के Articles में Trusts को दिए गए हैं। यही विशेष अधिकार अब Chandrasekaran की पुनर्नियुक्ति के विवाद के केंद्र में आ गए हैं।
Tata Trusts का तर्क है कि कुछ फैसलों के लिए उनके नामित निदेशकों की सकारात्मक सहमति जरूरी है। उनके अनुसार सामान्य बोर्ड बहुमत या चेयरमैन का casting vote इस विशेष शर्त को खत्म नहीं कर सकता। अगर इस व्याख्या को स्वीकार किया जाता है तो Tata Sons के बोर्ड में बहुमत से लिए जाने वाले फैसलों और Trusts के विशेष अधिकारों के बीच संबंध का सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाएगा।
लेकिन यहां 2021 के फैसले को लेकर एक जरूरी बात समझना भी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने उस समय Chandrasekaran की मौजूदा नियुक्ति पर कोई फैसला नहीं दिया था। वह मामला Cyrus Mistry की Tata Sons से हटाए जाने और उससे जुड़े कॉरपोरेट विवाद का था। इसलिए आज की कानूनी लड़ाई में अदालत को यह देखना होगा कि 2021 में जिन Articles और सिद्धांतों को बरकरार रखा गया था, उनकी व्याख्या मौजूदा परिस्थितियों में किस तरह की जाए।
इस विवाद में Tata Trusts की fiduciary जिम्मेदारियां भी चर्चा में हैं। 2021 के फैसले में अदालत ने Trusts की भूमिका और उनसे जुड़ी न्यासी जिम्मेदारियों पर भी टिप्पणियां की थीं। अब इन्हीं टिप्पणियों को मौजूदा विवाद के संदर्भ में सामने रखा जा रहा है। यानी सवाल केवल शेयरों का नहीं, बल्कि यह भी है कि Trusts अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल किस संस्थागत भूमिका और जिम्मेदारी के तहत करते हैं।
यही वजह है कि Tata Sons का मौजूदा विवाद सामान्य कॉरपोरेट बोर्ड विवाद से कहीं अधिक दिलचस्प बन गया है। एक तरफ बोर्ड का फैसला है, दूसरी तरफ बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले Tata Trusts हैं और बीच में कंपनी के Articles of Association की वे धाराएं हैं जिनकी कानूनी व्याख्या अब पूरे मामले की दिशा तय कर सकती है।
Tata समूह की कॉरपोरेट संरचना में Tata Sons की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए चेयरमैन की नियुक्ति को लेकर उठे सवाल का असर केवल एक पद पर नहीं देखा जा रहा। यह विवाद Tata समूह के भीतर बोर्ड, शेयरधारकों और Trusts के बीच अधिकारों के संतुलन को लेकर एक बड़ा कानूनी सवाल भी खड़ा कर रहा है।
अब सबसे ज्यादा नजर इस बात पर होगी कि मौजूदा विवाद में अदालत 2021 के फैसले को किस तरह देखती है। क्या उस फैसले में बरकरार रखे गए Trusts के विशेष अधिकार Chandrasekaran की पुनर्नियुक्ति के मामले में भी लागू होते हैं? क्या बोर्ड का सामान्य बहुमत पर्याप्त था? क्या Trusts के नामित निदेशकों की सकारात्मक सहमति जरूरी थी? और Articles of Association की संबंधित धाराओं की सही कानूनी व्याख्या क्या है? इन सवालों के जवाब ही आगे की तस्वीर साफ करेंगे।
इसलिए Tata Sons की मौजूदा लड़ाई को सिर्फ Chandrasekaran की कुर्सी का विवाद समझना अधूरा होगा। असली मुकाबला Tata समूह की कॉरपोरेट व्यवस्था में अधिकारों की व्याख्या को लेकर है। 2021 में Cyrus Mistry मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जिन विशेष प्रावधानों को बरकरार रखा था, वही प्रावधान अब पांच साल बाद फिर केंद्र में हैं। अब फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि उन अधिकारों की मौजूदा विवाद में कानूनी सीमा और प्रभाव क्या है।



