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बिहार में 71 हजार करोड़ का खर्च बेनामी, CAG रिपोर्ट से सियासी भूचाल

पटना/नई दिल्ली,

25 जुलाई 2025

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की हालिया रिपोर्ट ने बिहार सरकार की वित्तीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार 70,877 करोड़ रुपये के सार्वजनिक खर्चों का उपयोगिता प्रमाण पत्र (Utilisation Certificate – UC) जमा करने में विफल रही है। यह प्रमाण पत्र इस बात का सबूत होता है कि आवंटित राशि का सही ढंग से उपयोग हुआ है।

इस विस्फोटक खुलासे से बिहार की सियासत गरमा गई है, खासकर ऐसे समय में जब राज्य चुनाव की तैयारियों में जुटा है। रिपोर्ट कहती है कि कई योजनाओं और परियोजनाओं पर खर्च की गई राशि का कोई पुख्ता लेखा-जोखा सरकार के पास मौजूद नहीं है। CAG की यह आपत्ति वर्ष 2002-03 से 2022-23 तक लंबित UCs से जुड़ी है, जिनमें अधिकांश राशि शिक्षा, ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य और पंचायती राज विभागों के मद में खर्च हुई बताई गई है।

क्या है उपयोगिता प्रमाण पत्र?

UC वह दस्तावेज होता है जिसे किसी सरकारी विभाग या एजेंसी को यह सिद्ध करने के लिए जमा करना होता है कि उसे आवंटित फंड का प्रयोग नियमानुसार हुआ है। यदि कोई विभाग UC जमा नहीं करता, तो यह आशंका उत्पन्न होती है कि पैसे का दुरुपयोग या गबन हुआ है।

रिपोर्ट की मुख्य बातें:

  1. कुल 70,877.57 करोड़ रुपये के खर्च का कोई भरोसेमंद प्रमाण नहीं मिला।
  2. लगभग 20 वर्षों से उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित हैं।
  3. शिक्षा, ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभागों में सबसे ज्यादा गड़बड़ी की आशंका।
  4. CAG ने चेतावनी दी कि यह स्थिति वित्तीय अनुशासन को कमजोर करती है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया:

राज्य में विपक्षी दलों ने इसे सरकार की “वित्तीय विफलता” करार देते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके सहयोगियों से जवाब मांगा है। राजद और कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि यह “घोटालों की खान” है जिसे सरकार छुपा रही थी और अब चुनाव के ठीक पहले इसका पर्दाफाश हो गया है।

वहीं, जदयू और भाजपा ने जवाब में कहा कि कुछ विभागीय प्रक्रियाओं में विलंब हुआ है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि पैसे का दुरुपयोग हुआ है। वित्त विभाग जल्द ही सभी प्रमाण पत्र उपलब्ध करवा देगा।

चुनावी असर और भविष्य की राह:

चुनाव से पहले इस तरह की रिपोर्ट सरकार की छवि को प्रभावित कर सकती है। यह मामला अब विधानसभा और संसद दोनों में गूंज सकता है। CAG की रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए विपक्ष ने मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में उच्चस्तरीय जांच हो।

लगभग 71 हजार करोड़ रुपये की राशि का हिसाब न होना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, यह शासन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सीधा सवाल है। बिहार जैसे राज्य में, जहां विकास के लिए हर रुपये की अहमियत है, यह खुलासा जनता की चिंताओं को और गहरा करता है।

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