Home » National » डोकलाम के बाद चीन को रेलवे से जवाब! LAC के पास रणनीतिक रेल नेटवर्क को नई रफ्तार

डोकलाम के बाद चीन को रेलवे से जवाब! LAC के पास रणनीतिक रेल नेटवर्क को नई रफ्तार

सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा मजबूत करने की तैयारी; वर्षों से अटकी चालसा-नक्सलबाड़ी रेल परियोजना फिर पटरी पर

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 अगस्त 2026

भारत-चीन सीमा पर बढ़ते रणनीतिक तनाव के बीच भारत अब सीमावर्ती इलाकों में अपने सैन्य लॉजिस्टिक्स को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठा रहा है। डोकलाम गतिरोध के लगभग नौ साल बाद पश्चिम बंगाल की वर्षों से लंबित चालसा-नक्सलबाड़ी रेलवे परियोजना को फिर गति मिली है। इस परियोजना को केवल एक रेल लाइन नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर और सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा से जुड़ी महत्वपूर्ण रणनीतिक पहल माना जा रहा है।

करीब 20 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने लगभग 380 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया तेज कर दी है। भूमि विवाद के कारण 2011-12 में स्वीकृत यह परियोजना लंबे समय से अटकी हुई थी। अब इसके पूरा होने से भारत-चीन-भूटान त्रि-जंक्शन के निकट स्थित डोकलाम सेक्टर तक पहुंच और सैन्य रसद व्यवस्था मजबूत होने की उम्मीद है।

क्यों अहम है सिलीगुड़ी कॉरिडोर?

सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे ‘चिकन नेक’ भी कहा जाता है, भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्से से जोड़ने वाला एकमात्र जमीनी गलियारा है। यह भारत-चीन-भूटान सीमा के बेहद करीब स्थित है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस कॉरिडोर की सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी संकट की स्थिति में पूर्वोत्तर तक सेना और रसद पहुंचाने का यही मुख्य मार्ग है।

डोकलाम ने सिखाया बुनियादी ढांचे का महत्व

2017 में डोकलाम में भारत और चीन के बीच 73 दिनों तक सैन्य गतिरोध चला था। उस दौरान तेजी से सैनिकों और सैन्य उपकरणों की आवाजाही की आवश्यकता स्पष्ट हुई। भारत ने भूटान के समर्थन में चीन की सड़क निर्माण गतिविधियों का विरोध किया था, क्योंकि आशंका थी कि चीन जामफेरी रिज तक पहुंचकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर रणनीतिक दबाव बना सकता है।

हालांकि तत्कालीन संकट बातचीत से टल गया, लेकिन उसके बाद चीन ने डोकलाम और तिब्बत क्षेत्र में सड़कें, सैन्य शिविर, निगरानी चौकियां, रेलवे, हवाई अड्डे और अन्य सैन्य ढांचों का तेजी से विस्तार जारी रखा।

रेलवे नेटवर्क पर भारत का नया फोकस

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि मजबूत लॉजिस्टिक्स से भी जीते जाते हैं। बेहतर रेलवे नेटवर्क सैनिकों, भारी हथियारों, ईंधन और सैन्य सामग्री को कम समय में सीमा तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाता है।

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में सीमा सड़क संगठन (BRO) के जरिए कई रणनीतिक सड़कें, पुल और सुरंगें बनाई हैं। रक्षा मंत्रालय के अनुसार पिछले पांच वर्षों में चीन सीमा के साथ लगभग 2,089 किलोमीटर सड़कें तैयार की गई हैं। इसके साथ ही सेवोक-रंगपो रेलवे लाइन सहित कई सीमावर्ती रेल परियोजनाओं पर भी तेजी से काम चल रहा है।

चीन से मुकाबले की नई रणनीति

चीन ने तिब्बत में पहले से ही व्यापक रेलवे और सड़क नेटवर्क विकसित कर लिया है, जिससे वह सीमावर्ती इलाकों में कम समय में बड़ी संख्या में सैनिक और भारी सैन्य उपकरण तैनात कर सकता है। इसके मुकाबले भारत अभी भी कई अग्रिम क्षेत्रों में सड़क परिवहन पर अधिक निर्भर है, जो भूस्खलन, खराब मौसम और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है।

ऐसे में चालसा-नक्सलबाड़ी रेलवे परियोजना को भारत की व्यापक सीमा अवसंरचना रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञ इसे ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ बताते हैं, जो भविष्य में किसी भी आपात स्थिति में सेना की त्वरित तैनाती और रसद क्षमता को मजबूत करेगा।

भारत ने पिछले एक दशक में सीमा क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को लेकर अपनी नीति में बड़ा बदलाव किया है। पहले सीमा के बेहद करीब बड़े परिवहन नेटवर्क बनाने से परहेज किया जाता था, लेकिन अब मजबूत सड़क, सुरंग, पुल और रेलवे नेटवर्क को राष्ट्रीय सुरक्षा और विश्वसनीय प्रतिरोध क्षमता का अहम आधार माना जा रहा है। चालसा-नक्सलबाड़ी रेलवे परियोजना उसी बदली हुई रणनीति की एक महत्वपूर्ण कड़ी मानी जा रही है।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted