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गजब! अब बांग्लादेश की नाराज़गी पर भी सफाई? हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस से भारत ने झाड़ा पल्ला—आखिर इतनी सफाई की जरूरत क्यों?

दिल्ली में शेख हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर बांग्लादेश ने जताया ‘आक्रोश’, द्विपक्षीय रिश्तों पर असर की चेतावनी दी; नई दिल्ली के अधिकारियों ने दोहराया—कार्यक्रम में भारत सरकार की कोई भूमिका नहीं थी—सवाल यह कि एक स्वतंत्र प्रेस कार्यक्रम पर पड़ोसी देश को इतना स्पष्टीकरण क्यों?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 अगस्त 2026

बांग्लादेश नाराज़ हुआ और दिल्ली को सफाई देनी पड़ी—यह तस्वीर ही असहज करती है

गजब स्थिति है। भारत की राजधानी दिल्ली में बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करती हैं। बांग्लादेश सरकार उस पर नाराज़ होती है, इसे अपनी संप्रभुता का अपमान बताती है और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर इसके संभावित असर तक की चेतावनी देती है। इसके बाद नई दिल्ली के अधिकारी यह दोहराते हैं कि कार्यक्रम में भारत सरकार की कोई भूमिका नहीं थी और उसकी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। कूटनीति में स्पष्टीकरण देना कोई असामान्य बात नहीं, लेकिन यहां सवाल स्वाभाविक है—आखिर भारत को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए इतनी सफाई देने की जरूरत क्यों महसूस हुई? अगर कार्यक्रम सरकार ने आयोजित नहीं किया, सरकारी मंच नहीं था और भारत सरकार ने हसीना के आरोपों का समर्थन नहीं किया, तो बात वहीं खत्म होनी चाहिए थी। बांग्लादेश की नाराज़गी उसकी अपनी राजनीतिक प्रतिक्रिया है; उसे भारत के लिए अपराधबोध का कारण क्यों बनना चाहिए?

दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई है, ढाका की अनुमति से भारतीय राजधानी नहीं चलती

शेख हसीना ने दिल्ली के Foreign Correspondents’ Club से वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली पूर्व अंतरिम व्यवस्था पर मुक्ति संग्राम और बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की विरासत मिटाने की कोशिश का आरोप लगाया और मौजूदा तारिक रहमान सरकार पर भी हमला किया। उनके आरोप सही हैं या गलत, यह अलग बहस है और बांग्लादेश की राजनीति में उनका जवाब दिया जा सकता है। लेकिन क्या दिल्ली में किसी विदेशी राजनीतिक व्यक्ति के बोलने भर से भारत सरकार उस बयान की जिम्मेदार हो जाती है? अगर भारत सरकार ने मंच नहीं दिया, कार्यक्रम आयोजित नहीं किया और बयान तैयार नहीं कराया, तो हसीना के प्रत्येक शब्द का हिसाब नई दिल्ली क्यों दे? भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करता है। उसकी राजधानी में होने वाली हर राजनीतिक चर्चा के लिए पड़ोसी सरकारों से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने की परंपरा तो नहीं बनाई जा सकती।

ढाका को हसीना से आपत्ति है तो जवाब हसीना को दे, भारत को धमकी क्यों?

बांग्लादेश ने हसीना के आरोपों को अपनी संप्रभुता का अपमान और जुलाई विद्रोह में मारे गए लोगों का गंभीर अपमान बताया तथा द्विपक्षीय रिश्तों पर “likely ramifications” यानी संभावित असर की चेतावनी दी। यहीं भाषा पर सवाल उठता है। शेख हसीना बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री हैं और वहां की मौजूदा सत्ता की कटु राजनीतिक विरोधी हैं। उनके बयान पर बांग्लादेश सरकार आपत्ति जताए, तथ्यों से जवाब दे, उनके आरोपों को खारिज करे—यह उसका अधिकार है। लेकिन एक गैर-सरकारी प्रेस कार्यक्रम को भारत-बांग्लादेश संबंधों से जोड़कर चेतावनी देना अलग बात है। भारत सरकार हसीना की प्रवक्ता नहीं है और हसीना भारत सरकार की प्रवक्ता नहीं हैं। दोनों के बीच यह फर्क ढाका को भी समझना चाहिए और नई दिल्ली को भी पूरे आत्मविश्वास से स्पष्ट करना चाहिए।

भारत की ताकत इतनी कमजोर नहीं कि हर नाराज़ पड़ोसी को मनाता फिरे

भारत कोई छोटा या असुरक्षित देश नहीं है जिसे हर पड़ोसी की तीखी प्रतिक्रिया के बाद अपनी स्थिति समझाने के लिए दौड़ना पड़े। 140 करोड़ से अधिक आबादी, दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में स्थान, विशाल सैन्य और कूटनीतिक ताकत और दक्षिण एशिया में निर्णायक भूमिका रखने वाले भारत से अपेक्षा होती है कि वह अपने लोकतांत्रिक स्पेस को लेकर आत्मविश्वास दिखाए। इसका मतलब पड़ोसियों से झगड़ा करना नहीं है। जिम्मेदार विदेश नीति में संवेदनशीलता जरूरी है, लेकिन संवेदनशीलता और दबाव में दिखाई देना दो अलग चीजें हैं। भारत को इतना ही कहना पर्याप्त होना चाहिए—यह सरकारी कार्यक्रम नहीं था, वक्ता के विचार उसके अपने हैं। बस। इसके बाद हर राजनीतिक टिप्पणी का स्पष्टीकरण देना भारत की जिम्मेदारी नहीं हो सकती।

अगर हसीना भारत सरकार की मेहमान हैं, तब भी उनके हर शब्द की जिम्मेदारी भारत की नहीं

मामला इसलिए संवेदनशील जरूर है क्योंकि सत्ता से हटने के बाद शेख हसीना भारत में रह रही हैं और बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में उनका नाम बेहद विस्फोटक है। इसलिए ढाका स्वाभाविक रूप से भारत में उनकी राजनीतिक गतिविधियों को करीब से देखेगा। नई दिल्ली को भी यह ध्यान रखना होगा कि भारतीय जमीन किसी पड़ोसी देश को अस्थिर करने के सरकारी प्रयास का मंच बनती हुई न दिखाई दे। लेकिन इसका उल्टा सिद्धांत भी उतना ही जरूरी है—भारत में मौजूद किसी विदेशी नेता का हर बयान भारत सरकार का बयान नहीं बन जाता। यदि सरकार ने आयोजन नहीं कराया तो उसकी जिम्मेदारी तय करने की कोशिश भी उचित नहीं है।

सवाल यह नहीं कि बांग्लादेश से रिश्ते बिगाड़े जाएं, सवाल भारत की रीढ़ का है

भारत और बांग्लादेश पड़ोसी हैं। सीमा, व्यापार, सुरक्षा, पानी, कनेक्टिविटी और पूर्वोत्तर भारत से जुड़े अनेक हित दोनों देशों को एक-दूसरे से बांधते हैं। इसलिए भारत को जानबूझकर ढाका को उकसाने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन अच्छे रिश्ते केवल तब टिकाऊ होते हैं जब उनमें परस्पर सम्मान हो। यदि बांग्लादेश भारत से अपेक्षा करता है कि उसकी संप्रभुता का सम्मान किया जाए, तो उसे भी यह स्वीकार करना होगा कि भारत की राजधानी में होने वाली हर स्वतंत्र राजनीतिक गतिविधि पर ढाका का वीटो नहीं चल सकता। पड़ोसी होने का अर्थ एक-दूसरे की लोकतांत्रिक जगह नियंत्रित करना नहीं होता।

कल कोई और देश नाराज़ हुआ तो क्या हर बार दिल्ली सफाई देगी?

यही सबसे बड़ा सिद्धांतगत सवाल है। मान लीजिए कल दिल्ली में पाकिस्तान का कोई पूर्व नेता वहां की सरकार की आलोचना कर देता है। परसों श्रीलंका, नेपाल या किसी दूसरे देश का विपक्षी नेता अपने देश की सत्ता पर सवाल उठा देता है। क्या हर बार उस देश की सरकार के नाराज़ होते ही भारतीय अधिकारियों को सामने आकर कहना पड़ेगा कि हमारा इससे कोई लेना-देना नहीं? अगर यही मानक बन गया तो भारत की लोकतांत्रिक जगह धीरे-धीरे विदेशी सरकारों की संवेदनशीलताओं के हिसाब से तय होने लगेगी। विदेश नीति में संयम चाहिए, लेकिन अपनी जमीन पर अभिव्यक्ति के लिए दूसरे देशों की राजनीतिक सुविधा को अंतिम कसौटी नहीं बनाया जा सकता।

हसीना के आरोपों का समर्थन जरूरी नहीं, उनके बोलने के अधिकार का सवाल अलग है

यहां एक फर्क बहुत साफ रखना होगा। शेख हसीना ने जो आरोप लगाए, ABC NATIONAL NEWS उन्हें स्वतः सत्य नहीं मानता। बांग्लादेश की मौजूदा सरकार को उनका जवाब देने और तथ्य सामने रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन किसी के आरोपों से सहमत होना और उसे बोलने देने के सिद्धांत का समर्थन करना अलग-अलग बातें हैं। लोकतंत्र का अर्थ केवल वही भाषण सुनना नहीं है जो किसी सरकार को पसंद हो। यदि कोई बयान भारतीय कानून का उल्लंघन नहीं करता और कार्यक्रम सरकारी नहीं है, तो पड़ोसी देश की नाराज़गी अपने आप उसे भारत सरकार की जवाबदेही का मामला नहीं बना देती।

‘रणनीतिक स्वायत्तता’ केवल अमेरिका-चीन के सामने दिखाने की चीज नहीं

भारत बार-बार अपनी विदेश नीति को “strategic autonomy” यानी रणनीतिक स्वायत्तता से जोड़ता है। इसका अर्थ यही है कि भारत अपने फैसले अपने हितों के आधार पर करेगा, किसी दूसरे देश के दबाव पर नहीं। यह सिद्धांत केवल अमेरिका, चीन या रूस जैसे बड़े देशों के संदर्भ में लागू नहीं होना चाहिए। पड़ोस की नीति में भी भारत को उतना ही स्पष्ट होना पड़ेगा। बांग्लादेश महत्वपूर्ण पड़ोसी है, उसकी चिंताओं को सुनना चाहिए, लेकिन उसकी नाराज़गी भारत की घरेलू लोकतांत्रिक गतिविधियों की सीमा तय नहीं कर सकती।

ढाका की नाराज़गी समझिए, लेकिन दिल्ली को कटघरे में मत खड़ा कीजिए

बांग्लादेश के अपने राजनीतिक घाव हैं। जुलाई आंदोलन, हसीना का सत्ता से हटना, उसके बाद की राजनीतिक उथल-पुथल और नई सत्ता व्यवस्था—इन सबने वहां गहरी राजनीतिक खाई पैदा की है। इसलिए शेख हसीना की हर सार्वजनिक मौजूदगी ढाका में तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर सकती है। भारत को उस संवेदनशीलता को समझना चाहिए। लेकिन संवेदनशीलता समझने और उसके सामने झुकने में फर्क है। अगर प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत सरकार शामिल नहीं थी, तो नई दिल्ली का रुख बेहद साफ होना चाहिए—आपकी राजनीतिक लड़ाई आपकी है; भारत को उसमें पक्षकार मत बनाइए।

भारत को सफाई नहीं, स्पष्टता दिखानी चाहिए

नई दिल्ली ने यह स्पष्ट करके ठीक किया कि कार्यक्रम में सरकार की भूमिका नहीं थी। तथ्य स्पष्ट करना कूटनीतिक कमजोरी नहीं होता। लेकिन उसके बाद मामला वहीं समाप्त होना चाहिए। भारत को न हसीना के राजनीतिक आरोपों का बोझ अपने सिर लेना चाहिए और न बांग्लादेश की नाराज़गी के दबाव में ऐसा संदेश देना चाहिए कि दिल्ली में कौन बोलेगा और क्या बोलेगा, यह ढाका की प्रतिक्रिया देखकर तय होगा।

भारत को बांग्लादेश से अच्छे रिश्ते चाहिए—लेकिन बराबरी और सम्मान के रिश्ते। अगर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस से ढाका नाराज़ होता है तो भारत तथ्य बता सकता है, लेकिन उसे कठघरे में खड़े आरोपी की तरह सफाई देने की जरूरत नहीं है। क्योंकि सवाल आखिर बहुत सीधा है—दिल्ली में हुई एक गैर-सरकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस का जवाब भारत सरकार क्यों दे? हसीना ने जो कहा है, उसका राजनीतिक जवाब हसीना से मांगिए; भारत से नहीं।

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