खेल | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 अगस्त 2026
भारतीय क्रिकेट में खिलाड़ियों की फिटनेस को लेकर पिछले कई वर्षों में नियम लगातार सख्त किए गए हैं। कभी Yo-Yo टेस्ट को फिटनेस का बड़ा पैमाना बनाया गया, फिर दो किलोमीटर टाइम ट्रायल आया और अब Bronco टेस्ट पर जोर बढ़ा है। लेकिन इतने टेस्ट, विशेषज्ञों, फिजियो और अत्याधुनिक Centre of Excellence के बावजूद टीम इंडिया लगातार खिलाड़ियों की चोट और फिटनेस संबंधी समस्याओं से जूझ रही है। हर्षित राणा, मोहम्मद सिराज और जसप्रीत बुमराह के हालिया मामले इस व्यवस्था के भीतर एक बड़ी समस्या की तरफ इशारा करते हैं—सवाल अब यह नहीं रह गया है कि खिलाड़ी कितनी तेज दौड़ सकता है, बल्कि यह है कि जिस खिलाड़ी को एक स्तर पर फिट घोषित किया जाता है, वही कुछ समय बाद दूसरे स्तर पर अनफिट कैसे हो जाता है?
हर्षित राणा का मामला इस उलझन को सबसे साफ तरीके से सामने रखता है। रिपोर्ट के मुताबिक BCCI के Centre of Excellence यानी CoE ने उन्हें करीब 97 किलो वजन के साथ फिटनेस क्लीयरेंस दे दिया था। इसके कुछ समय बाद भारतीय टीम मैनेजमेंट ने कथित तौर पर उन्हें लगभग चार किलो अधिक वजन वाला माना। इंग्लैंड दौरे पर उनका शरीर भी अपेक्षित भार नहीं संभाल पाया और अंततः उन्हें वापस बेंगलुरु भेजना पड़ा। यहां सवाल हर्षित के वजन से कहीं बड़ा है। 97 किलो वजन अपने आप किसी खिलाड़ी को फिट या अनफिट साबित नहीं करता। असली सवाल यह है कि जब Centre of Excellence ने उन्हें खेलने के लिए तैयार माना था, तो उस क्लीयरेंस में आखिर किन चीजों की जांच की गई थी? यदि टीम मैनेजमेंट की फिटनेस की परिभाषा अलग थी, तो CoE और राष्ट्रीय टीम के मानकों में अंतर क्यों था?
मोहम्मद सिराज का मामला लगभग उलटी समस्या सामने रखता है। सिराज भारतीय क्रिकेट के उन तेज गेंदबाजों में शामिल हैं जिन्होंने लंबे स्पेल और लगातार मैच खेलकर अपनी शारीरिक क्षमता साबित की है। लेकिन श्रीलंका दौरे से पहले जब वह Centre of Excellence पहुंचे तो रिपोर्ट के अनुसार उन्हें बदले हुए फिटनेस मानकों का सामना करना पड़ा, जिनकी जानकारी अनुबंधित खिलाड़ियों को लगभग उसी समय दी जा रही थी। यानी जिस खिलाड़ी को टेस्ट देना था, उसके लिए नए मानक पर्याप्त समय पहले उसकी नियमित तैयारी का हिस्सा ही नहीं बने थे। फिटनेस टेस्ट अगर अचानक होने वाली परीक्षा बन जाए तो वह केवल खिलाड़ी की वास्तविक फिटनेस नहीं, बल्कि उस खास टेस्ट की तैयारी को भी मापने लगता है।
हर्षित और सिराज के मामले इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि दोनों एक ही सिस्टम की दो अलग कमजोरियां दिखाते हैं। एक खिलाड़ी ऐसे मानकों के तहत क्लीयर हो गया जो कथित तौर पर पर्याप्त स्पष्ट या एकसमान नहीं थे, जबकि दूसरे स्थापित अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी को ऐसे संशोधित मानकों का सामना करना पड़ा जिनकी तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिलने पर सवाल उठे। यदि राष्ट्रीय टीम, Centre of Excellence, ट्रेनर और खिलाड़ियों के बीच इस बुनियादी बात पर ही स्पष्टता नहीं है कि ‘फिट’ होने का मतलब क्या है, तो किसी भी टेस्ट का स्कोर अपने आप में अधूरा प्रमाण बन जाता है।
इस विवाद के बीच Jasprit Bumrah का मामला फिटनेस सिस्टम की तीसरी चुनौती सामने लाता है—rehabilitation और वापसी की तारीख का सही आकलन। बुमराह को शुरुआत में टेस्ट टीम में शामिल किया गया था, लेकिन उनकी उपलब्धता फिटनेस क्लीयरेंस पर निर्भर थी। इंग्लैंड में लगी बाएं घुटने की चोट से वह पूरी तरह नहीं उबर पाए और आखिरकार श्रीलंका सीरीज से बाहर हो गए। किसी चोट से ठीक होने की निश्चित तारीख बताना हमेशा संभव नहीं होता और रिकवरी में बदलाव सामान्य बात है, लेकिन जब चयन के समय खिलाड़ी की वापसी की उम्मीद जताई जाए और बाद में पता चले कि वह अभी पूरी तरह तैयार ही नहीं है, तो मेडिकल आकलन और चयन प्रक्रिया के बीच समन्वय पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कप्तान Shubman Gill भी फिटनेस को लेकर टीम की समस्या सार्वजनिक रूप से सामने रख चुके हैं। इंग्लैंड में ODI सीरीज के निर्णायक मुकाबले में हार के बाद उन्होंने कहा था कि टीम को एक समूह के रूप में अपनी फिटनेस सुधारने की जरूरत है। उनकी चिंता का संदर्भ भी बड़ा है—ODI World Cup जैसे टूर्नामेंट में किसी टीम को लगातार 11 मुकाबलों तक अपनी सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध टीम बनाए रखने की जरूरत पड़ सकती है। यदि छोटी द्विपक्षीय सीरीज में ही चोट के कारण टीम अपनी पसंदीदा प्लेइंग इलेवन नहीं उतार पा रही है, तो विश्व कप जैसे लंबे टूर्नामेंट में समस्या कहीं अधिक गंभीर हो सकती है।
भारतीय क्रिकेट में फिटनेस टेस्ट की कमी नहीं रही है। Yo-Yo टेस्ट खिलाड़ी की बार-बार तेज शारीरिक प्रयास करने और थोड़े आराम के बाद फिर उसी तीव्रता से काम करने की क्षमता को जांचता है। दो किलोमीटर टाइम ट्रायल लगातार दौड़ने की क्षमता और endurance का पैमाना है। वहीं strength and conditioning coach Adrian le Roux के दौर में Bronco टेस्ट पर जोर बढ़ा है। Bronco में खिलाड़ी को 20 मीटर, 40 मीटर और 60 मीटर की shuttle runs पांच लगातार सेट में करनी होती हैं। कुल दूरी करीब 1,200 मीटर होती है, लेकिन लगातार मुड़ना, गति पकड़ना और फिर दिशा बदलना इसे सामान्य 1,200 मीटर की दौड़ से काफी कठिन बना देता है।
समस्या यह है कि इनमें से कोई भी टेस्ट अकेले यह तय नहीं कर सकता कि खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने के लिए पूरी तरह तैयार है। एक खिलाड़ी Bronco शानदार समय में पूरा कर सकता है, लेकिन उसके शरीर पर गेंदबाजी का अत्यधिक workload हो सकता है। दूसरा खिलाड़ी 2K रन आसानी से पूरा कर सकता है, लेकिन किसी पुराने जोड़ या मांसपेशी की समस्या से जूझ सकता है। किसी खिलाड़ी का वजन ज्यादा होने का अर्थ अपने आप यह नहीं कि वह मैच के लिए अनफिट है और कम वजन वाला खिलाड़ी अपने आप फिट नहीं हो जाता। Body composition, mobility, muscle strength, bowling load, पुरानी चोटों का इतिहास, recovery rate और मैच के दौरान शरीर पर पड़ने वाला वास्तविक दबाव—इन सभी को एक साथ देखकर फैसला करना पड़ता है।
रिपोर्ट में एक और गंभीर पहलू सामने आया है। Centre of Excellence में कथित तौर पर Bronco टेस्ट के लिए सभी खिलाड़ियों पर एक ही अनिवार्य समय लागू करने के बजाय अलग-अलग खिलाड़ियों के लिए customised targets इस्तेमाल किए जा रहे थे और कुछ वरिष्ठ खिलाड़ियों को अपेक्षाकृत सहज मानक मिलने की बात भी कही गई। हर्षित राणा और नीतीश कुमार रेड्डी उन खिलाड़ियों में बताए गए जिन्हें टीम मैनेजमेंट की जरूरतों के बीच क्लीयरेंस मिला। अब CoE कथित तौर पर Bronco के लिए लगभग 5 मिनट 15 सेकंड से 5 मिनट 20 सेकंड और 2K रन के लिए करीब 9 से 10 मिनट के साझा मानक की दिशा में बढ़ा है। एकसमान मानक प्रक्रिया को ज्यादा स्पष्ट बना सकते हैं, लेकिन केवल टाइमिंग तय कर देने से पूरी समस्या खत्म नहीं होगी।
इस पूरे विवाद के बीच भारतीय टीम के physio Kamlesh Jain और Centre of Excellence की कार्यप्रणाली भी जांच और सवालों के घेरे में बताई जा रही है। बार-बार खिलाड़ियों के चोटिल होने, cramping और mobility संबंधी समस्याओं को लेकर सवाल उठे हैं। कप्तान Gill और मुख्य कोच Gautam Gambhir के भी लगातार पूर्ण ताकत वाली टीम नहीं उतार पाने से परेशान होने की खबरें हैं। हालांकि हर चोट का दोष किसी एक physio पर डालना भी गलत होगा। तेज गेंदबाजी अपने आप में शरीर पर भारी दबाव डालती है, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का कैलेंडर बेहद व्यस्त है और कई चोटों को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ मेडिकल व्यवस्था भी पूरी तरह नहीं रोक सकती।
लेकिन इसी जटिलता के पीछे जवाबदेही गायब भी नहीं हो सकती। किसी न किसी स्तर पर यह फैसला होना ही चाहिए कि खिलाड़ी मैच खेलने के लिए तैयार है या नहीं। यदि Centre of Excellence फिटनेस प्रमाणपत्र देता है तो राष्ट्रीय टीम को उस प्रमाणपत्र का अर्थ ठीक वही समझना चाहिए जो CoE समझता है। यदि टीम मैनेजमेंट शरीर के वजन, endurance या workload को लेकर अलग मानक चाहता है तो वह खिलाड़ी को क्लीयर करने से पहले तय होना चाहिए, बाद में नहीं।
इसीलिए भारतीय क्रिकेट की असली समस्या यह नहीं है कि Yo-Yo बेहतर है या Bronco, अथवा दोनों के साथ 2K टेस्ट भी होना चाहिए। असली सवाल यह है कि BCCI, Centre of Excellence, चयनकर्ता, डॉक्टर, physio, strength and conditioning staff और टीम मैनेजमेंट क्या फिटनेस की एक ही भाषा बोल रहे हैं?
हर्षित राणा का 97 किलो में क्लीयर होकर बाद में ‘ओवरवेट’ माना जाना, मोहम्मद सिराज का अचानक बदले हुए मानकों से सामना और जसप्रीत बुमराह की वापसी को लेकर शुरुआती उम्मीदों के बाद उनका सीरीज से बाहर होना—तीनों अलग घटनाएं हैं, लेकिन इनके बीच एक साझा धागा दिखाई देता है: testing, rehabilitation, workload management और final clearance के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत।
BCCI चाहे Bronco का समय और कठिन कर दे, 2K की सीमा तय कर दे या खिलाड़ियों के लिए नए फिटनेस नियम बना दे, इससे आधी समस्या ही हल होगी। असली सुधार उस दिन होगा जब बेंगलुरु में जारी हुआ ‘फिट’ का प्रमाणपत्र टीम इंडिया के ड्रेसिंग रूम में भी ठीक उसी अर्थ में स्वीकार किया जाए। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में फिटनेस का मतलब केवल टेस्ट पास करना नहीं है—फिटनेस का असली अर्थ मैदान पर उतरना, पूरा मुकाबला खेलना और लगातार सीरीज में शरीर को उसी स्तर पर बनाए रखना है।




