राष्ट्रीय/राजनीति | अरिंदम बनर्जी | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता/नई दिल्ली | 8 जून 2026
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा भूचाल आता दिखाई दे रहा है, जो न केवल तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) बल्कि पूरे विपक्षी खेमे की राजनीति को प्रभावित कर सकता है। लोकसभा में टीएमसी के 29 सांसदों में से 20 सांसदों के कथित तौर पर पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोलने और अलग संसदीय समूह बनाकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को समर्थन देने की खबरों ने राजनीतिक गलियारों में सनसनी फैला दी है। यदि यह घटनाक्रम आगे बढ़ता है, तो इसे ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती माना जाएगा।
बताया जा रहा है कि बागी सांसदों ने नई दिल्ली में महत्वपूर्ण बैठकों का दौर शुरू कर दिया है। इन बैठकों के केंद्र में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव का आवास रहा, जहां कई सांसदों की मौजूदगी ने अटकलों को और तेज कर दिया। राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि सांसदों का एक बड़ा वर्ग पार्टी की मौजूदा कार्यशैली और नेतृत्व से असंतुष्ट है तथा वे संसद में अलग पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इस घटनाक्रम ने न केवल कोलकाता बल्कि दिल्ली की राजनीति को भी गर्म कर दिया है।
तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से ममता बनर्जी के मजबूत नेतृत्व के कारण एकजुट दिखाई देती रही है। लेकिन हाल के वर्षों में पार्टी के भीतर बढ़ती असंतुष्टि की चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। कई नेताओं का मानना है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया कुछ सीमित हाथों में सिमटती जा रही है। यदि सांसदों की यह कथित बगावत वास्तविक रूप लेती है, तो यह संकेत होगा कि पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर गंभीर मतभेद मौजूद हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल सांसदों की नाराजगी का मामला नहीं है, बल्कि पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों का भी परिणाम हो सकता है। भाजपा लगातार राज्य में अपनी राजनीतिक उपस्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है और टीएमसी के भीतर किसी भी प्रकार का विभाजन उसके लिए बड़ा अवसर साबित हो सकता है। यही कारण है कि इस पूरे घटनाक्रम पर राष्ट्रीय राजनीति की नजरें टिकी हुई हैं।
इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर INDIA गठबंधन पर पड़ सकता है। ममता बनर्जी विपक्षी राजनीति की सबसे प्रमुख नेताओं में गिनी जाती हैं और भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की मजबूत आवाज रही हैं। ऐसे में यदि उनकी पार्टी में टूट की स्थिति बनती है, तो विपक्षी एकता के दावों को गंभीर झटका लग सकता है। इससे संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।
हालांकि अभी तक तृणमूल कांग्रेस की ओर से इस कथित बगावत को लेकर कोई अंतिम स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है और आने वाले दिनों में तस्वीर और साफ होगी। लेकिन इतना तय है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। यदि 20 सांसदों का समूह वास्तव में अलग रास्ता चुनता है, तो यह केवल टीएमसी का संकट नहीं होगा बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी एक बड़े बदलाव का संकेत होगा।




