अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/काठमांडू | 5 जून 2026
नेपाल में नई सरकार के गठन के साथ भारत-नेपाल संबंध एक नए मोड़ पर पहुंच गए हैं। नेपाल में प्रधानमंत्री बालेन्द्र (बालेन) शाह के नेतृत्व में नई राजनीतिक व्यवस्था उभरकर सामने आई है, जिसने पारंपरिक राजनीतिक दलों को पीछे छोड़ते हुए सत्ता हासिल की है। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह नेपाल के साथ अपने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंधों को नई राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप ढाले। विशेषज्ञों का मानना है कि अब भारत को नेपाल के साथ “बड़े भाई” की छवि से बाहर निकलकर “समान साझेदार” के रूप में आगे बढ़ना होगा, क्योंकि नेपाल की नई पीढ़ी की राजनीति सम्मानजनक और संतुलित संबंधों पर अधिक जोर दे रही है।
भारत और नेपाल के संबंध केवल दो पड़ोसी देशों के रिश्ते नहीं हैं, बल्कि यह खुली सीमा, रोटी-बेटी के संबंध, साझा संस्कृति, धार्मिक आस्था और आर्थिक निर्भरता पर आधारित एक अनूठा रिश्ता है। नेपाल के कुल व्यापार का बड़ा हिस्सा भारत से जुड़ा है और पेट्रोलियम, खाद्य सामग्री, मशीनरी तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं के लिए वह काफी हद तक भारत पर निर्भर है। दूसरी ओर लाखों नेपाली नागरिक भारत में काम करते हैं और दोनों देशों के बीच लोगों का आवागमन बिना वीजा के होता है। यही कारण है कि काठमांडू में होने वाला हर राजनीतिक बदलाव नई दिल्ली के लिए भी महत्वपूर्ण बन जाता है।
हालांकि पिछले कुछ वर्षों में भारत-नेपाल संबंधों में कई बार तनाव भी देखने को मिला। कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे सीमा विवादों ने दोनों देशों के बीच राजनीतिक मतभेद बढ़ाए। नेपाल की राजनीति में समय-समय पर भारत विरोधी भावनाओं का इस्तेमाल भी किया गया। नई सरकार के सत्ता में आने के बाद भी ये मुद्दे पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। हाल के दिनों में नेपाल के नेताओं और भारतीय प्रतिनिधियों के बीच हुई बैठकों में सीमा विवाद और जल संसाधनों के बंटवारे जैसे विषय चर्चा के केंद्र में रहे हैं। भारत ने स्पष्ट किया है कि ऐसे विवादों का समाधान केवल द्विपक्षीय बातचीत से ही संभव है और किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार नहीं की जाएगी।
नई नेपाली सरकार का सबसे बड़ा एजेंडा आर्थिक विकास, रोजगार सृजन, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और प्रशासनिक सुधार है। बालेन शाह और उनकी पार्टी युवाओं की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं। ऐसे में भारत के लिए अवसर यह है कि वह नेपाल के विकास एजेंडे का प्रमुख भागीदार बने। ऊर्जा, जलविद्युत, सड़क, रेलवे, डिजिटल कनेक्टिविटी और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर दोनों देश आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाई दे सकते हैं। नेपाल की विशाल जलविद्युत क्षमता भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए भी महत्वपूर्ण है और दोनों देशों के बीच पहले से हुए बिजली व्यापार समझौते इस दिशा में नई संभावनाएं पैदा करते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि नई सरकार बनने के बाद नेपाल के शीर्ष नेताओं की भारत यात्राएं तेजी से बढ़ी हैं। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल का भारत दौरा और सत्तारूढ़ दल के नेताओं की नई दिल्ली में उच्चस्तरीय मुलाकातें इस बात का संकेत हैं कि दोनों देश रिश्तों को नई शुरुआत देना चाहते हैं। यह प्रधानमंत्री बालेन शाह सरकार के गठन के बाद भारत की ओर पहला महत्वपूर्ण राजनीतिक संपर्क माना जा रहा है। दोनों पक्षों की प्राथमिकता व्यापार, निवेश, ऊर्जा सहयोग और रणनीतिक विश्वास को मजबूत करना है।
भारत के सामने एक और चुनौती चीन के बढ़ते प्रभाव की है। नेपाल लंबे समय से भारत और चीन के बीच संतुलन बनाने की नीति अपनाता रहा है। नेपाल की विदेश नीति का मूल सिद्धांत भी दोनों पड़ोसी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना है। ऐसे में भारत को किसी प्रतिस्पर्धा की मानसिकता के बजाय नेपाल की संप्रभुता और स्वतंत्र निर्णय क्षमता का सम्मान करते हुए सहयोग बढ़ाना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि दबाव की राजनीति के बजाय भरोसे और विकास आधारित साझेदारी ही भारत के लिए सबसे प्रभावी रणनीति होगी।
कुल मिलाकर नेपाल में नई सरकार भारत के लिए चुनौती और अवसर दोनों लेकर आई है। चुनौती इसलिए कि नेपाल की नई राजनीतिक पीढ़ी पुराने समीकरणों से अलग सोच रखती है, और अवसर इसलिए कि विकास, निवेश, ऊर्जा तथा कनेक्टिविटी के क्षेत्र में सहयोग की नई संभावनाएं खुल रही हैं। यदि नई दिल्ली सम्मान, समानता और आपसी हितों के आधार पर काठमांडू के साथ संबंधों को आगे बढ़ाती है, तो आने वाले वर्षों में भारत-नेपाल साझेदारी दक्षिण एशिया की सबसे मजबूत और स्थिर क्षेत्रीय साझेदारियों में से एक बन सकती है।




