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‘न्यू इंडिया’ में मंत्री इस्तीफा नहीं देते, इंटरव्यू देते हैं : जब जवाबदेही की मौत हो जाए, तब पीआर ही शासन बन जाता है

ओपिनियन | आलोक रंजन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 29 मई 2026

भारत का लोकतंत्र एक अजीब दौर से गुजर रहा है। एक समय था जब सत्ता में बैठे लोग पद को सम्मान समझते थे और जिम्मेदारी को बोझ नहीं बल्कि कर्तव्य मानते थे। कोई बड़ी दुर्घटना हो जाए, प्रशासनिक विफलता सामने आ जाए या किसी मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो जाएं, तो मंत्री नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे देते थे। लेकिन वह शायद “पुराने भारत” की बात थी। “न्यू इंडिया” में नैतिकता को संग्रहालय में रख दिया गया है और जवाबदेही को टीवी स्टूडियो में।आज हालात यह हैं कि पुल गिर जाए, ट्रेन टकरा जाए, परीक्षा का पेपर बिक जाए, लाखों छात्रों का भविष्य बर्बाद हो जाए, तब भी मंत्री इस्तीफा नहीं देते। वे प्राइम टाइम पर बैठकर बताते हैं कि उनकी सरकार ने पिछले दस वर्षों में कितनी ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की हैं। मानो जनता जवाब नहीं, विज्ञापन सुनने बैठी हो।

NEET: परीक्षा छात्रों की थी, परीक्षा सरकार की हो गई

NEET-UG 2024 और 2026 का पेपर लीक प्रकरण केवल एक परीक्षा घोटाला नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था की पोल खोलता है जो दावा करती है कि वह दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे आधुनिक परीक्षा प्रणाली चला रही है। लाखों छात्रों ने वर्षों तक दिन-रात एक किया, परिवारों ने अपनी बचत दांव पर लगाई, माता-पिता ने सपनों की पूरी पूंजी अपने बच्चों की पढ़ाई में झोंक दी। लेकिन कुछ लोगों ने उन सपनों को बाजार में बेच दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं कहा कि पेपर लीक की घटनाएं छात्रों और परिवारों के लिए “ट्रॉमैटिक” हैं। अदालत की यह टिप्पणी केवल कानूनी टिप्पणी नहीं बल्कि व्यवस्था के मुंह पर तमाचा थी। लेकिन आश्चर्य देखिए, इस तमाचे की गूंज अदालत तक ही सीमित रह गई। सत्ता के गलियारों में न तो कोई आत्मग्लानि दिखाई दी और न ही कोई नैतिक बेचैनी।

न्यू इंडिया का नया सिद्धांत: सफलता मेरी, विफलता सिस्टम की

आज राजनीति का सबसे लोकप्रिय मंत्र है—”सफलता का श्रेय ऊपर जाएगा और विफलता का दोष नीचे आएगा।”

अगर परीक्षा सफल हो जाए तो मंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे। अगर परीक्षा फेल हो जाए तो जिम्मेदार कोई क्लर्क, कोई अधिकारी, कोई एजेंसी या कोई माफिया होगा। मंत्री केवल सफलता के सीईओ हैं, विफलता के नहीं।

यह वही देश है जहां कभी रेल दुर्घटना के बाद रेल मंत्री इस्तीफा दे देते थे। आज हजारों छात्रों के भविष्य पर ग्रहण लग जाए, तब भी मंत्री कैमरे के सामने मुस्कुराते हुए कहते हैं—”हमने जांच के आदेश दे दिए हैं।”

जांच अब जवाबदेही का विकल्प बन चुकी है। जैसे ही कोई संकट आता है, एक समिति बना दी जाती है, एक जांच बैठा दी जाती है और फिर कुछ महीनों बाद जनता को नया मुद्दा दे दिया जाता है।

इंटरव्यू संस्कृति बनाम इस्तीफा संस्कृति

आज भारतीय राजनीति में एक नई परंपरा विकसित हुई है—”इंटरव्यू संस्कृति”।

पुराने दौर में संकट के बाद इस्तीफा आता था, अब एक्सक्लूसिव इंटरव्यू आता है। पहले नेता जिम्मेदारी लेते थे, अब नैरेटिव सेट करते हैं। पहले जनता सवाल पूछती थी, अब एंकर सरकार की उपलब्धियां गिनाते हैं।

ऐसा लगता है जैसे शासन प्रशासन नहीं, पीआर एजेंसी चला रही हो। हर संकट के बाद सरकार का पहला उद्देश्य समस्या का समाधान नहीं बल्कि छवि का प्रबंधन बन जाता है।

टीवी स्टूडियो में बैठकर राष्ट्रवाद, विकास और वैश्विक नेतृत्व पर लंबी बातें होती हैं, लेकिन कोई यह नहीं बताता कि आखिर बार-बार पेपर लीक क्यों हो रहे हैं? आखिर करोड़ों रुपये खर्च करने वाली संस्थाएं इतनी असुरक्षित कैसे हैं? आखिर जवाबदेह कौन है?

छात्रों का दर्द और सत्ता की संवेदनहीनता

सबसे दुखद बात यह है कि इस पूरे प्रकरण में सबसे कम सुनी गई आवाज छात्रों की है।

वह छात्र जिसने दो साल कोचिंग की, जिसने मोबाइल छोड़ दिया, जिसने दोस्तों से दूरी बना ली, जिसने अपनी पूरी युवावस्था एक परीक्षा के नाम कर दी—उसे फिर से परीक्षा देने के लिए कहा जाएगा। उसके माता-पिता फिर से तनाव झेलेंगे। उसका भविष्य फिर से अनिश्चितता में झूलेगा।

लेकिन जिनके नेतृत्व में यह पूरी व्यवस्था चल रही थी, उनके पद, सुविधाएं, सुरक्षा और सत्ता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

यही “न्यू इंडिया” का नया गणित है—कष्ट जनता का, कीमत छात्रों की, लेकिन कुर्सी सत्ता की सुरक्षित।

लोकतंत्र भाषणों से नहीं, जवाबदेही से चलता है

लोकतंत्र का असली आधार चुनाव नहीं, जवाबदेही है। चुनाव तो तानाशाही देशों में भी हो जाते हैं। लोकतंत्र की पहचान यह है कि सत्ता अपने कार्यों के लिए उत्तरदायी हो।

यदि मंत्री केवल उपलब्धियों का श्रेय लेंगे और विफलताओं की जिम्मेदारी लेने से इंकार करेंगे, तो संस्थाओं में जनता का विश्वास धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। और जब जनता का विश्वास खत्म होता है, तब लोकतंत्र केवल चुनावी मशीन बनकर रह जाता है।

सवाल किसी एक मंत्री या किसी एक सरकार का नहीं है। सवाल उस राजनीतिक संस्कृति का है जिसमें नैतिकता को कमजोरी और इस्तीफे को हार माना जाने लगा है।

“न्यू इंडिया” की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यहां मंत्री नैतिक जिम्मेदारी के आधार पर इस्तीफा नहीं देते। वे टीवी चैनलों पर आते हैं, इंटरव्यू देते हैं, उपलब्धियां गिनाते हैं और अगले संकट तक आगे बढ़ जाते हैं।

लेकिन इतिहास इंटरव्यू नहीं याद रखता। इतिहास यह याद रखता है कि संकट के समय सत्ता ने जवाबदेही दिखाई थी या नहीं। कुर्सी बचाना राजनीति की सफलता हो सकती है, लेकिन जनता का भरोसा बचाना लोकतंत्र की सफलता होती है।

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