अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग/ब्रसेल्स | 29 मई 2026
यूरोप चुनिंदा आंकड़ों का इस्तेमाल कर रहा है : चीन
दुनिया की दो बड़ी आर्थिक ताकतों — चीन और यूरोपीय संघ — के बीच व्यापारिक तनाव अब खुलकर सामने आने लगा है। यूरोप द्वारा चीनी आयात पर टैरिफ और कोटा बढ़ाने की तैयारी के बीच चीन ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए आरोप लगाया है कि यूरोपीय संघ “चुनिंदा व्यापार आंकड़ों” का इस्तेमाल करके व्यापार असंतुलन का गलत नैरेटिव बना रहा है। बीजिंग ने साफ चेतावनी दी है कि अगर यूरोप ने संरक्षणवादी कदम उठाए तो चीन अपने हितों की रक्षा के लिए जवाबी कार्रवाई करेगा।
यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले ही युद्ध, महंगाई, सप्लाई चेन संकट और ऊर्जा अस्थिरता से जूझ रही है। अब चीन और यूरोप के बीच बढ़ता आर्थिक टकराव दुनिया के नए “ट्रेड वॉर” की आशंका को और मजबूत कर रहा है।
यूरोप क्यों डरा हुआ है चीन से?
यूरोपीय संघ का मानना है कि चीन की सरकारी सब्सिडी, सस्ती मैन्युफैक्चरिंग और आक्रामक निर्यात नीति यूरोप के उद्योगों के अस्तित्व के लिए खतरा बनती जा रही है। यूरोप को डर है कि अगर अभी कड़े कदम नहीं उठाए गए तो केमिकल, मेटल, क्लीन टेक्नोलॉजी और इलेक्ट्रिक वाहन जैसे कई रणनीतिक सेक्टर पूरी तरह चीनी कंपनियों के कब्जे में चले जाएंगे।
यूरोपीय उद्योग प्रमुख स्टीफेन सेजॉर्ने ने साफ कहा कि कुछ औद्योगिक क्षेत्रों पर “अस्तित्व का संकट” मंडरा रहा है। इसी वजह से ब्रसेल्स अब केवल कंपनियों या विशेष उत्पादों पर नहीं बल्कि पूरे सेक्टर पर आयात कोटा और टैरिफ लागू करने की योजना बना रहा है।
फ्रांस, इटली और स्पेन जैसे बड़े यूरोपीय देश इस नीति को तेजी से आगे बढ़ाना चाहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि चीन की “सस्ती बाढ़” यूरोपीय फैक्ट्रियों और नौकरियों को खत्म कर सकती है।
चीन का जवाब: “व्यापार एकतरफा नहीं होता”
चीन की विदेश मंत्रालय प्रवक्ता माओ निंग ने यूरोप के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यूरोप केवल वस्तुओं के व्यापार को देख रहा है जबकि सेवाओं, निवेश और मुनाफे के प्रवाह को नजरअंदाज कर रहा है। उनके मुताबिक अगर केवल सामानों के व्यापार घाटे को देखकर निष्कर्ष निकाला जाएगा तो तस्वीर हमेशा एकतरफा दिखाई देगी।
माओ निंग ने कहा कि “कोई भी देश चीन के साथ व्यापार करने के लिए मजबूर नहीं है।” उन्होंने यह भी कहा कि चीन जानबूझकर यूरोप के साथ व्यापार अधिशेष हासिल करने की कोशिश नहीं करता। चीन का दावा है कि यूरोपीय कंपनियां भी चीनी बाजार से भारी मुनाफा कमाती हैं, लेकिन यूरोप केवल अपने घाटे की चर्चा करता है।
बीजिंग ने यूरोप के “डी-रिस्किंग” और “ट्रेड बैलेंस” जैसे शब्दों को सीधा संरक्षणवाद बताया। चीन का कहना है कि यह मुक्त व्यापार के सिद्धांतों के खिलाफ है और पश्चिम अब चीन की आर्थिक ताकत से डरकर नियम बदलना चाहता है।
359 अरब यूरो का घाटा बना बड़ा मुद्दा
यूरोप का चीन के साथ व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। 2025 में यह घाटा बढ़कर लगभग 359.9 अरब यूरो तक पहुंच गया। यही आंकड़ा अब यूरोप की राजनीतिक और आर्थिक चिंता का सबसे बड़ा कारण बन चुका है।
यूरोप का आरोप है कि चीनी कंपनियां सरकारी मदद के दम पर बेहद सस्ते उत्पाद वैश्विक बाजार में उतारती हैं, जिससे यूरोपीय कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाता है। खासतौर पर इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, स्टील, केमिकल और सोलर सेक्टर में चीन की बढ़त ने यूरोप की बेचैनी बढ़ा दी है।
इलेक्ट्रिक कार और ग्रीन टेक्नोलॉजी बना नया युद्धक्षेत्र
चीन आज दुनिया की सबसे बड़ी इलेक्ट्रिक वाहन ताकत बन चुका है। BYD, Nio, XPeng और Xiaomi जैसी कंपनियां न केवल चीन बल्कि यूरोप के बाजारों में भी तेजी से पैर पसार रही हैं। यूरोप को डर है कि यदि चीनी कंपनियों की यह रफ्तार जारी रही तो उसकी अपनी ऑटो इंडस्ट्री कमजोर पड़ सकती है।
इसी कारण यूरोप अब ग्रीन टेक्नोलॉजी सेक्टर को “रणनीतिक सुरक्षा” के नजरिए से देखने लगा है। यानी अब व्यापार केवल आर्थिक मामला नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और औद्योगिक अस्तित्व का सवाल बन चुका है।
क्या दुनिया नए ट्रेड वॉर की तरफ बढ़ रही है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका और चीन के बाद अब यूरोप और चीन के बीच भी व्यापार युद्ध जैसी स्थिति बन सकती है। अमेरिका पहले ही चीनी EV और टेक्नोलॉजी कंपनियों पर भारी टैरिफ लगा चुका है। अब अगर यूरोप भी उसी राह पर चलता है तो वैश्विक सप्लाई चेन और अधिक अस्थिर हो सकती है।
इसका असर केवल चीन और यूरोप तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। वैश्विक व्यापार महंगा होगा, उत्पादों की कीमतें बढ़ेंगी और कई विकासशील देशों की मैन्युफैक्चरिंग रणनीतियां प्रभावित होंगी।
चीन की चेतावनी: “हम जवाब देंगे”
बीजिंग ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि यूरोप ने व्यापक टैरिफ या आयात कोटा लागू किए तो चीन चुप नहीं बैठेगा। चीन पहले भी कई बार जवाबी टैरिफ, निर्यात नियंत्रण और बाजार पहुंच सीमित करने जैसे कदम उठा चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन दुर्लभ खनिज, बैटरी सप्लाई चेन और मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क में अपनी मजबूत पकड़ का इस्तेमाल रणनीतिक दबाव बनाने के लिए कर सकता है।
दुनिया की अर्थव्यवस्था अब दो खेमों में बंटती दिख रही
पूरी दुनिया धीरे-धीरे दो आर्थिक ध्रुवों में बंटती दिखाई दे रही है। एक तरफ पश्चिमी देश अपनी इंडस्ट्री बचाने के लिए संरक्षणवादी नीतियों की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर चीन वैश्विक बाजारों में अपनी आर्थिक पकड़ और तकनीकी ताकत को लगातार बढ़ा रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले वर्षों में व्यापार, टेक्नोलॉजी, एआई, बैटरी, चिप्स और ग्रीन एनर्जी सेक्टर में यही संघर्ष दुनिया की नई भू-राजनीति तय करेगा।
आने वाले महीनों में और बढ़ सकता है तनाव
यूरोपीय आयोग के भीतर शुक्रवार को होने वाली चर्चाएं इस पूरे विवाद को नई दिशा दे सकती हैं। अगर यूरोप ने औपचारिक रूप से नए टैरिफ और कोटा लागू करने का फैसला लिया, तो चीन की प्रतिक्रिया और अधिक आक्रामक हो सकती है।
फिलहाल इतना साफ है कि दुनिया अब केवल सैन्य या राजनीतिक संघर्षों से नहीं बल्कि आर्थिक और तकनीकी युद्धों के नए दौर में प्रवेश कर चुकी है — और चीन बनाम यूरोप की यह टक्कर उसी बड़े बदलाव का हिस्सा है।




