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चीन की इलेक्ट्रिक कार क्रांति से हिल गई दुनिया : अमेरिका – यूरोप – जापान की दिग्गज कंपनियां दबाव में

अंतरराष्ट्रीय / व्यापार/ टेक्नोलॉजी | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग | 29 मई 2026

मुकाबला सिर्फ कारों का नहीं, तकनीक और भविष्य का है

दुनिया की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियां इस समय एक ऐसे संकट का सामना कर रही हैं, जिसकी कल्पना शायद उन्होंने एक दशक पहले नहीं की थी। कभी चीन को केवल सस्ती मैन्युफैक्चरिंग का केंद्र समझने वाली अमेरिकी, यूरोपीय और जापानी कार कंपनियां अब उसी चीन से तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी, सॉफ्टवेयर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दौड़ में पीछे छूटती दिखाई दे रही हैं।

बीबीसी की एक विस्तृत रिपोर्ट ने चीन की ऑटो इंडस्ट्री के उस नए चेहरे को दुनिया के सामने रखा है, जहां कारें अब केवल मशीन नहीं बल्कि “स्मार्टफोन ऑन व्हील्स” बन चुकी हैं। बीजिंग और हेफेई स्थित फैक्ट्रियों में जिस स्तर की ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट देखने को मिली, उसने दुनिया की पुरानी ऑटो कंपनियों की नींद उड़ा दी है।

“हमारा कोई मुकाबला नहीं”: होंडा प्रमुख की स्वीकारोक्ति

जापान की दिग्गज कंपनी होंडा के सीईओ तोशिहिरो मिबे ने चीन की एक अत्याधुनिक फैक्ट्री देखने के बाद माना कि जापानी कंपनियां इस रफ्तार का मुकाबला नहीं कर पा रही हैं। उन्होंने कहा, “हमारे पास इनके खिलाफ कोई मौका नहीं है।”

फोर्ड के सीईओ जिम फार्ले ने भी चेतावनी दी कि पश्चिमी ऑटो कंपनियां “अपने अस्तित्व की लड़ाई” लड़ रही हैं। यह बयान इस बात का संकेत है कि चीन अब केवल दुनिया का उत्पादन केंद्र नहीं बल्कि वैश्विक तकनीकी नेतृत्व की तरफ बढ़ चुका है।

कार नहीं, पूरा डिजिटल इकोसिस्टम बेच रहा है चीन

चीन की बढ़त केवल इलेक्ट्रिक कारों तक सीमित नहीं है। वहां की कंपनियां कार, मोबाइल, ऐप, स्मार्ट होम और एआई सिस्टम को जोड़कर एक पूरा डिजिटल इकोसिस्टम तैयार कर रही हैं।

चीन की टेक कंपनी Xiaomi इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरी है। जिसने 2024 में अपनी पहली इलेक्ट्रिक कार लॉन्च की थी और अब वह चीन की सबसे तेजी से बढ़ती EV कंपनियों में शामिल हो चुकी है। Xiaomi की फैक्ट्री में हर 76 सेकंड में एक नई कार तैयार हो रही है।

कंपनी का मकसद केवल वाहन बेचना नहीं बल्कि यूजर को एक ऐसा डिजिटल अनुभव देना है जिसमें मोबाइल, घर और कार एक-दूसरे से जुड़े हों।

BYD, Nio और XPeng ने बदला खेल

चीन की BYD कंपनी ने ऐसी अल्ट्रा-फास्ट चार्जिंग तकनीक विकसित की है जिससे कार केवल पांच मिनट में लगभग 400 किलोमीटर तक चलने लायक चार्ज हो जाती है। यानी पेट्रोल भरवाने जितना समय और पूरी EV चार्ज।

Nio की फैक्ट्रियां लगभग पूरी तरह रोबोट आधारित हो चुकी हैं जबकि XPeng अब केवल कार कंपनी नहीं रहना चाहती। XPeng के संस्थापक हे शियाओपेंग ने कहा कि आने वाले समय में हर कार कंपनी रोबोटिक्स कंपनी भी होगी। कंपनी अब ह्यूमनॉइड रोबोट और उड़ने वाली कारों पर भी काम कर रही है।

चीन कैसे बना दुनिया का EV सुपरपावर?

विशेषज्ञों के अनुसार चीन की सफलता अचानक नहीं आई। बीते कई वर्षों में चीनी सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी उद्योग में अरबों डॉलर का निवेश किया। बैटरी निर्माण, सप्लाई चेन और मैन्युफैक्चरिंग मशीनरी में चीन ने इतनी मजबूत पकड़ बना ली कि अब वहां इलेक्ट्रिक SUV बनाना पश्चिमी देशों के मुकाबले करीब 30 प्रतिशत सस्ता पड़ता है।

यूरोप और अमेरिका लगातार चीन पर बाजार बिगाड़ने वाले सब्सिडी मॉडल का आरोप लगाते रहे हैं, लेकिन इन सरकारी प्रोत्साहनों ने चीनी कंपनियों को बेहद तेजी से आगे बढ़ाया।

विदेशी कंपनियां अब चीन से सीखने को मजबूर

एक समय था जब विदेशी कंपनियां चीन को तकनीक देती थीं और बदले में चीन उन्हें बाजार और फैक्ट्री देता था। अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।

Volkswagen जैसी जर्मन कंपनी ने XPeng के सॉफ्टवेयर और ऑटोनॉमस ड्राइविंग सिस्टम तक पहुंच पाने के लिए 700 मिलियन डॉलर का निवेश किया है क्योंकि कंपनी खुद इतनी तेजी से तकनीक विकसित नहीं कर पा रही।

Stellantis ने चीन की सरकारी कंपनी Dongfeng के साथ एक अरब यूरो की नई डील की है। अब यूरोप की कंपनियां चीन में केवल उत्पादन नहीं बल्कि तकनीकी साझेदारी करने को मजबूर हो रही हैं।

चीन के आगे कमजोर पड़ रही पुरानी ऑटो ताकतें

चीन के घरेलू बाजार में विदेशी कंपनियों की हिस्सेदारी लगातार घट रही है। 2020 में जहां विदेशी कंपनियों का मार्केट शेयर 64 प्रतिशत था, वहीं अब यह घटकर लगभग 32 प्रतिशत रह गया है।

General Motors को चीन में अरबों डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा है। Audi को अपनी नई E5 मॉडल पर भारी छूट देनी पड़ी। जापानी कंपनियां EV की दौड़ में देर से उतरीं और अब चीन तथा दक्षिण-पूर्व एशिया दोनों जगह दबाव में हैं।

चीन की Huawei समर्थित लक्जरी कार Maextro S800 अब 1 लाख डॉलर से महंगी कारों की श्रेणी में Porsche और BMW जैसी कंपनियों को पीछे छोड़ चुकी है।

दुनिया की नौकरियों और उद्योगों पर भी असर

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वाहन उत्पादन, बैटरी तकनीक और सॉफ्टवेयर विकास तेजी से चीन की ओर शिफ्ट होता रहा तो यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई ऑटो हब प्रभावित हो सकते हैं। इससे लाखों नौकरियों पर असर पड़ सकता है।

यूरोप ने चीनी EV पर 45 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए हैं, जबकि अमेरिका ने 100 प्रतिशत से अधिक शुल्क लगाकर चीनी कारों को लगभग अपने बाजार से बाहर कर दिया है। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि केवल टैरिफ से चीन को रोका नहीं जा सकता।

“दुनिया की ऑटो इंडस्ट्री का केंद्र अब बदल चुका है”

ऑटो विश्लेषक बिल रूसो के अनुसार दुनिया की ऑटो इंडस्ट्री का “सेंटर ऑफ ग्रैविटी” अब पश्चिम से चीन की तरफ शिफ्ट हो चुका है। उनके मुताबिक जो कंपनियां चीन के साथ सहयोग करेंगी, वही भविष्य में टिक पाएंगी, जबकि जो केवल रोकने की कोशिश करेंगी वे पीछे छूट जाएंगी।

यह पूरी कहानी केवल कार उद्योग की नहीं बल्कि उस वैश्विक बदलाव की है जिसमें चीन अब तकनीक, एआई, बैटरी, सॉफ्टवेयर और स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग के जरिए दुनिया की आर्थिक और औद्योगिक ताकतों को खुली चुनौती दे रहा है।

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