राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 24 मई 2026
सुप्रीम कोर्ट द्वारा देशद्रोह कानून यानी भारतीय दंड संहिता की धारा 124A से जुड़े मामलों में “सहमति देने वाले आरोपियों” के खिलाफ कार्यवाही की अनुमति दिए जाने के बाद देश में फिर से इस औपनिवेशिक कानून को लेकर बहस तेज हो गई है। अदालत के इस ताज़ा रुख ने उन चिंताओं को दोबारा जगा दिया है, जिनमें लंबे समय से कहा जाता रहा है कि यह कानून अंग्रेजों के दौर का दमनकारी हथियार था, जिसका इस्तेमाल असहमति दबाने के लिए किया जाता रहा।
गौरतलब है कि मई 2022 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने धारा 124A के तहत चल रही सभी कार्यवाहियों पर रोक लगा दी थी। उस समय केंद्र सरकार ने भी अदालत में माना था कि यह कानून “वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं” है और यह उस दौर का कानून है जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। इसके बाद माना जा रहा था कि देशद्रोह कानून का भविष्य लगभग खत्म हो चुका है।
लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुछ मामलों में कार्यवाही की अनुमति दिए जाने के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में नई बहस छिड़ गई है। संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि जब खुद इस कानून की संवैधानिक वैधता सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के दायरे में है, तब इसकी सीमित वापसी भी नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों का आरोप है कि धारा 124A का इस्तेमाल अक्सर सरकारों द्वारा आलोचकों, पत्रकारों, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर दबाव बनाने के लिए किया गया। उनका कहना है कि लोकतंत्र में असहमति को देशद्रोह नहीं माना जा सकता। वहीं सरकार समर्थक पक्ष का तर्क है कि राष्ट्रविरोधी गतिविधियों और हिंसा भड़काने वाले मामलों से निपटने के लिए कुछ कानूनी प्रावधान जरूरी हैं।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला यह तय करेगा कि क्या भारत वास्तव में इस औपनिवेशिक विरासत से पूरी तरह बाहर निकल पाएगा या फिर “देशद्रोह” की परिभाषा नए रूप में भारतीय कानून व्यवस्था का हिस्सा बनी रहेगी। फिलहाल अदालत के इस ताज़ा कदम ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा की बहस को केंद्र में ला दिया है।




