राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/लेह | 24 मई 2026
केंद्र सरकार लद्दाख के लिए एक नए प्रशासनिक और विधायी मॉडल पर काम कर रही है, लेकिन इसके बावजूद वहां राज्य का दर्जा और संवैधानिक सुरक्षा की मांग खत्म होती नहीं दिख रही। लेह एपेक्स बॉडी (LAB) के सह-संयोजक चेयरिंग दोरजय लकरुक ने साफ कहा है कि “हम अपनी स्टेटहुड की मांग छोड़ नहीं रहे हैं। अगर फिलहाल यह संभव नहीं है, तब भी यह मांग जारी रहेगी।”
दरअसल, गृह मंत्रालय ने हाल ही में लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के साथ हुई बैठक में लद्दाख को मौजूदा केंद्रशासित प्रदेश ढांचे के भीतर अधिक विधायी, वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार देने का प्रस्ताव रखा है। केंद्र का दावा है कि यह मॉडल लद्दाख की विशेष भौगोलिक और सांस्कृतिक जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है।
हालांकि, लद्दाख के सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का कहना है कि उनकी मूल मांगें अब भी पूरी नहीं हुई हैं। वर्ष 2020 से LAB और KDA लगातार राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची में शामिल किए जाने और जमीन, रोजगार तथा संस्कृति की संवैधानिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि बिना संवैधानिक संरक्षण के लद्दाख की पहचान, संसाधन और स्थानीय अधिकार खतरे में पड़ सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र सरकार एक ऐसा मॉडल तैयार करना चाहती है जिसमें लद्दाख को सीमित स्वायत्तता मिले, लेकिन पूर्ण राज्य का दर्जा न देना पड़े। वहीं स्थानीय संगठनों का तर्क है कि सिर्फ प्रशासनिक अधिकार पर्याप्त नहीं हैं, जब तक कि स्थानीय लोगों को अपने संसाधनों और नीतियों पर कानूनी अधिकार न मिले।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, लद्दाख का मुद्दा आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति और केंद्र-राज्य संबंधों की बहस का बड़ा विषय बन सकता है। चीन सीमा से लगे इस रणनीतिक क्षेत्र में केंद्र किसी भी बड़े राजनीतिक बदलाव को बेहद सावधानी से देख रहा है, जबकि स्थानीय लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर लगातार मुखर होते जा रहे हैं।
फिलहाल केंद्र और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन साफ संकेत मिल रहे हैं कि “विशेष मॉडल” की पेशकश के बावजूद लद्दाख में राज्य के दर्जे और संवैधानिक सुरक्षा की मांग अभी खत्म होने वाली नहीं है।




