राष्ट्रीय / मध्य प्रदेश / समाज | काव्या अग्रवाल | ABC NATIONAL NEWS | मध्य प्रदेश | 24 मई 2026
विकास के दावों के बीच पानी के लिए पहाड़ों पर जान जोखिम में डालती बेटियां
तपती धूप… सूखी धरती… फटे हुए पहाड़… और उनके बीच पानी की एक-एक बूंद के लिए मौत से लड़ती जिंदगी। मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के आदिवासी इलाकों से सामने आई तस्वीरें केवल एक खबर नहीं, बल्कि उस भारत का दर्द हैं जिसे चमकते विकास के नारों के बीच अक्सर भुला दिया जाता है।
भीषण गर्मी में जब तापमान 45 डिग्री के पार पहुंच चुका है, तब छोटी-छोटी बच्चियां और महिलाएं अपनी जान जोखिम में डालकर खतरनाक पहाड़ियों से नीचे उतर रही हैं, सिर्फ इसलिए ताकि घर में पीने के लिए थोड़ा पानी पहुंच सके। ढीले पत्थर, गहरी खाइयां और झुलसाती गर्म हवाएं—हर कदम पर मौत मंडरा रही है। लेकिन प्यास उससे भी बड़ी मजबूरी बन चुकी है।
ये वही उम्र है जब इन बच्चियों के हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, खेल के खिलौने होने चाहिए थे, सपने होने चाहिए थे। मगर उनके कंधों पर पानी के बर्तन हैं और आंखों में डर। कोई बच्ची फिसल जाए तो शायद अगले दिन सिर्फ एक आंकड़ा बनकर रह जाए।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो ने लोगों को भावुक और गुस्से से भर दिया है। कई लोगों ने सवाल उठाया कि आखिर “ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी” का क्या मतलब है, अगर देश की बेटियों को पानी के लिए अपनी जान दांव पर लगानी पड़े? लोगों ने लिखा कि जब देश आधुनिक तकनीक, एआई और बड़े-बड़े विकास मॉडल की बात कर रहा है, तब भी गांवों में पीने के पानी जैसी बुनियादी जरूरत पूरी नहीं हो पा रही।
आलोचकों ने केंद्र और राज्य सरकारों पर भी सवाल उठाए हैं। लोगों का कहना है कि एक तरफ हजारों करोड़ रुपये बड़े आयोजनों, विदेशी दौरों और चमकदार परियोजनाओं पर खर्च किए जा रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ गांवों में इंसान बुनियादी मानव गरिमा के लिए संघर्ष कर रहा है। जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं के बावजूद कई ग्रामीण इलाकों में हैंडपंप सूख चुके हैं और महिलाएं कई किलोमीटर दूर खतरनाक रास्तों से पानी लाने को मजबूर हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती गर्मी, जल स्रोतों का सूखना और खराब जल प्रबंधन आने वाले समय में देश के लिए सबसे बड़ा मानवीय संकट बन सकता है। सवाल केवल पानी का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें विकास के आंकड़े तो चमकते हैं, लेकिन गांवों की प्यास अब भी अधूरी है।
आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या विकास सिर्फ शहरों की रोशनी तक सीमित रहेगा? या फिर वह उस आखिरी बच्ची तक पहुंचेगा, जो इस वक्त किसी पहाड़ से उतरते हुए सिर्फ एक बाल्टी पानी के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगाए हुए है।




