अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | कोच्चि/रियाद | 24 मई 2026
करीब दो दशकों तक सऊदी अरब की जेल में मौत की सजा के साए में जिंदगी गुजारने वाले केरल के अब्दुल रहीम आखिरकार अब आजाद होकर अपने वतन लौटने की तैयारी में हैं। यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि इंसानियत, उम्मीद और दुनिया भर के आम लोगों के सामूहिक प्रयास की मिसाल बन गई है। वर्ष 2006 में एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसे के बाद सऊदी अरब में गिरफ्तार हुए अब्दुल रहीम को मौत की सजा सुनाई गई थी। लेकिन अब पीड़ित परिवार द्वारा 34 करोड़ रुपये की “ब्लड मनी” स्वीकार किए जाने के बाद उनकी फांसी की सजा टल चुकी है और उनकी रिहाई की अंतिम कानूनी प्रक्रिया पूरी की जा रही है।
केरल के कोझिकोड जिले के रहने वाले अब्दुल रहीम अपने परिवार के छह भाई-बहनों में सबसे छोटे हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वह ऑटो-रिक्शा और स्कूल बस चलाकर घर चलाते थे। बेहतर भविष्य की तलाश में वह 28 नवंबर 2006 को सऊदी अरब के रियाद पहुंचे, जहां उन्हें ड्राइवर की नौकरी मिली। इसके साथ ही उन्हें अपने मालिक के 17 वर्षीय लकवाग्रस्त बेटे की देखभाल की जिम्मेदारी भी दी गई थी, जो पूरी तरह लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर था। 24 दिसंबर 2006 को एक यात्रा के दौरान गलती से उस किशोर का ब्रीदिंग सपोर्ट सिस्टम हट गया, जिससे उसकी मौत हो गई। इस घटना के बाद रहीम को गिरफ्तार कर लिया गया और वर्ष 2011 में उन्हें मौत की सजा सुना दी गई। बाद में ऊपरी अदालतों ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।
लंबे समय तक कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी, लेकिन वर्ष 2024 में कहानी ने नया मोड़ लिया। पीड़ित परिवार मध्यस्थता के लिए तैयार हुआ और मुआवजा स्वीकार करने पर सहमत हो गया। हालांकि 34 करोड़ रुपये जैसी विशाल रकम जुटाना रहीम के गरीब परिवार के लिए असंभव था। इसके बाद केरल में “सेव अब्दुल रहीम” अभियान शुरू किया गया, जिसने देखते ही देखते वैश्विक समर्थन हासिल कर लिया। सोशल मीडिया के जरिए यह मुहिम दुनिया भर के मलयाली समुदाय, प्रवासी मजदूरों, सामाजिक संगठनों और आम लोगों तक पहुंची। हजारों लोगों ने छोटी-बड़ी रकम देकर योगदान किया और कुछ ही हफ्तों में पूरी राशि जमा हो गई। मशहूर कारोबारी बॉबी चेम्मनूर समेत कई प्रमुख हस्तियों ने भी इस अभियान में सक्रिय भूमिका निभाई।
रहीम के परिवार ने पिछले 20 साल बेहद दर्द और अनिश्चितता में बिताए। उनके जेल जाने के कुछ ही महीनों बाद उनके पिता का निधन हो गया था, जबकि उनकी मां वर्षों तक बेटे से मिलने का इंतजार करती रहीं। उन्हें केवल कभी-कभार वीडियो कॉल के जरिए बेटे को देखने का मौका मिलता था। अब जबकि उनकी 20 साल की सजा पूरी हो चुकी है, सऊदी प्रशासन रिहाई की अंतिम औपचारिकताएं पूरी कर रहा है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और भारतीय दूतावास की मदद से उनकी जल्द वापसी की उम्मीद जताई जा रही है। यह मामला अब केवल एक कानूनी कहानी नहीं, बल्कि मानवता, करुणा और सामूहिक प्रयास की ऐसी मिसाल बन चुका है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है।




