राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | बेंगलुरु | 24 मई 2026
कर्नाटक में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत चुनाव आयोग ने भले ही 87.49 प्रतिशत वोटर मैपिंग पूरी होने का दावा किया हो, लेकिन जमीनी स्तर पर काम कर रहे बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) का कहना है कि वास्तविक स्थिति अभी भी काफी जटिल और अधूरी है। खासकर प्रवासी मजदूरों, गरीब तबकों और हाशिए पर रहने वाले समुदायों की सही पहचान और रिकॉर्ड अपडेट करना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। BLOs के अनुसार रिकॉर्ड में गड़बड़ी, लगातार पलायन और तकनीकी समस्याओं के कारण लाखों मतदाताओं तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है।
मैदानी कर्मचारियों का कहना है कि कई इलाकों में मतदाता सूची और वास्तविक निवास की जानकारी मेल नहीं खा रही है। बड़ी संख्या में लोग काम की तलाश में एक शहर से दूसरे शहर या दूसरे राज्यों में चले जाते हैं, जिससे उनका सत्यापन करना बेहद कठिन हो जाता है। कई बार फोन नंबर बंद मिलते हैं या नेटवर्क की समस्या के कारण संपर्क नहीं हो पाता। इसके अलावा गरीब और वंचित वर्गों के पास स्थायी दस्तावेजों की कमी भी एक बड़ी समस्या बन रही है। BLOs का कहना है कि सरकारी आंकड़ों में प्रगति दिखाई दे रही है, लेकिन वास्तविकता में कई परिवार अब भी पूरी तरह मैप नहीं हो पाए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे विशाल और तेजी से शहरीकरण वाले देश में वोटर डेटा को पूरी तरह अपडेट रखना एक बहुत बड़ी प्रशासनिक चुनौती है। प्रवासी मजदूर, झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग और असंगठित क्षेत्र के कामगार अक्सर चुनावी व्यवस्था से सबसे ज्यादा कट जाते हैं। इससे न केवल मतदान प्रतिशत प्रभावित होता है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर भी असर पड़ सकता है। कई सामाजिक संगठनों ने आशंका जताई है कि यदि मैपिंग और सत्यापन की प्रक्रिया में सावधानी नहीं बरती गई, तो बड़ी संख्या में पात्र मतदाता सूची से बाहर रह सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है that आने वाले चुनावों से पहले मतदाता सूची की शुद्धता बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा बनने जा रही है। चुनाव आयोग पर यह दबाव बढ़ रहा है कि वह तकनीक के साथ-साथ जमीनी स्तर पर मानवीय और सामाजिक चुनौतियों को भी समझे। विशेषज्ञों के अनुसार केवल डिजिटल डेटा के भरोसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए स्थानीय स्तर पर विश्वसनीय और संवेदनशील व्यवस्था की भी जरूरत है। फिलहाल कर्नाटक में जारी SIR अभियान ने यह साफ कर दिया है कि देश में प्रवासी और हाशिए पर रहने वाले समुदाय अब भी चुनावी व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं।




