Home » National » महिला सहकर्मी को घूरना या ताक झांक करना अपराध नहीं : बॉम्बे हाईकोर्ट

महिला सहकर्मी को घूरना या ताक झांक करना अपराध नहीं : बॉम्बे हाईकोर्ट

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

राष्ट्रीय | मुंबई | विशेष रिपोर्ट

महिला सहकर्मी को घूरना Voyeurism नहीं

मुंबई से सामने आए एक अहम फैसले में Bombay High Court ने साफ कर दिया है कि किसी महिला सहकर्मी को घूरना भले ही गलत और असभ्य व्यवहार हो, लेकिन इसे भारतीय कानून के तहत “ताक-झांक” यानी Voyeurism नहीं माना जा सकता। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि कानून की एक तय परिभाषा होती है और हर अनुचित व्यवहार को आपराधिक अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस फैसले ने कार्यस्थलों पर व्यवहार, नैतिकता और कानून के बीच की सीमाओं को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है, क्योंकि यह मामला केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

दरअसल यह मामला एक निजी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी से जुड़ा था, जिन पर उनकी ही महिला सहकर्मी ने आरोप लगाया था कि वह मीटिंग के दौरान उन्हें असहज करने वाले तरीके से देखते थे और उनकी नजरें बार-बार उनके शरीर के कुछ हिस्सों पर टिक जाती थीं। महिला ने इसे अपनी गरिमा के खिलाफ बताया और शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 354C के तहत मामला दर्ज किया। यह धारा खास तौर पर Voyeurism यानी किसी महिला की निजी गतिविधियों को चोरी-छिपे देखने या रिकॉर्ड करने से जुड़ी है। शिकायत के बाद मामला अदालत तक पहुंचा और लंबे समय तक इसकी सुनवाई चली।

अदालत ने पूरे मामले की गहराई से जांच करते हुए IPC की धारा 354C की कानूनी व्याख्या पर जोर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Voyeurism तब माना जाता है जब कोई व्यक्ति किसी महिला की निजी गतिविधियों—जैसे कपड़े बदलते समय, बाथरूम का इस्तेमाल करते समय या किसी निजी क्षण में—चोरी-छिपे देखता है या उसकी तस्वीर/वीडियो बनाता है। लेकिन ऑफिस, मीटिंग या किसी सार्वजनिक पेशेवर माहौल में किसी को घूरना इस परिभाषा में नहीं आता। अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों में कानून का विस्तार करना न्यायसंगत नहीं होगा और इससे कानून का दुरुपयोग भी हो सकता है।

इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि कंपनी की इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (ICC) ने पहले ही जांच कर ली थी और आरोपी के खिलाफ ठोस सबूत नहीं पाए थे। अदालत ने इस तथ्य को भी गंभीरता से लिया और माना कि जब आंतरिक जांच में आरोप साबित नहीं हुए और कानूनी तत्व भी पूरे नहीं होते, तो आपराधिक मामला चलाना उचित नहीं है। इसी आधार पर कोर्ट ने 2015 में दर्ज FIR को रद्द कर दिया और आरोपी को राहत देते हुए पूरे मामले को समाप्त कर दिया।

हालांकि अदालत ने आरोपी को कानूनी राहत दी, लेकिन अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह का व्यवहार किसी भी स्थिति में सही नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने माना कि किसी महिला को इस तरह घूरना उसे असहज और अपमानित महसूस करा सकता है, जो कि सामाजिक और नैतिक रूप से गलत है। लेकिन कानून केवल उन्हीं मामलों में सख्त कार्रवाई करता है, जो उसकी तय परिभाषा में आते हैं। इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने यह संदेश भी दिया कि समाज में सम्मानजनक व्यवहार बनाए रखना हर आदमी की जिम्मेदारी है, चाहे वह कानून के दायरे में आए या नहीं।

यह फैसला एक तरफ जहां कानून की सीमाओं को स्पष्ट करता है, वहीं दूसरी तरफ समाज को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या केवल कानून से बच जाना ही काफी है, या हमें अपने व्यवहार को भी बेहतर बनाने की जरूरत है। कार्यस्थलों पर महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा आज के समय की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है, और इसके लिए केवल कानूनी प्रावधान ही नहीं, बल्कि संवेदनशील सोच और जिम्मेदार आचरण भी उतना ही जरूरी है।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments