ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 10 अप्रैल 2026
भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में कुछ ऐसे औज़ार हैं, जिन्होंने आम आदमी—यानी उस “आदमी” को, जिसकी आवाज़ अक्सर सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंचती—को न्याय दिलाने का रास्ता दिया। सूचना का अधिकार (RTI) और जनहित याचिका (PIL) ऐसे ही दो सशक्त माध्यम रहे हैं। लेकिन हाल के घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या इन औज़ारों को धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है? क्या अब PIL की प्रासंगिकता पर सवाल उठाकर उसे सीमित या समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं?
हाल ही में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी कि जनहित याचिका की व्यवस्था अब अपनी मूल आवश्यकता पूरी कर चुकी है और इसका दुरुपयोग बढ़ गया है, इसलिए इसे परिभाषित करने या यहां तक कि समाप्त करने का समय आ गया है। यह तर्क पहली नजर में प्रशासनिक सुधार की दिशा में उठाया गया कदम लग सकता है, लेकिन जब इसे व्यापक संदर्भ में देखा जाता है, तो यह लोकतांत्रिक जवाबदेही के मूल ढांचे पर असर डालने वाला प्रस्ताव प्रतीत होता है।
जनहित याचिका की शुरुआत 1970-80 के दशक में उस समय हुई थी, जब देश का एक बड़ा तबका न्याय तक पहुंच से वंचित था। गरीबी, अशिक्षा और कानूनी जानकारी की कमी के कारण आम नागरिक अदालतों तक नहीं पहुंच पाते थे। ऐसे में न्यायपालिका ने इस व्यवस्था को विकसित किया, ताकि कोई भी संवेदनशील नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता या संगठन किसी भी जनहित के मुद्दे को अदालत के सामने रख सके। यह केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं था, बल्कि न्याय को “सुलभ” बनाने का एक क्रांतिकारी कदम था।
पिछले चार दशकों में PIL ने भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है। पर्यावरण संरक्षण से लेकर महिला अधिकारों तक, भ्रष्टाचार से लेकर श्रमिकों के शोषण तक—ऐसे अनगिनत मुद्दे हैं, जिन पर अदालत ने PIL के माध्यम से हस्तक्षेप किया और व्यवस्था को सुधारने का काम किया। यह कहना गलत नहीं होगा कि PIL ने कई बार उस आवाज़ को मंच दिया, जो सत्ता और प्रशासन के दबाव में दब जाती थी।
सरकार का तर्क है कि अब हालात बदल चुके हैं—ई-फाइलिंग, कानूनी सहायता तंत्र और संस्थागत सुधारों के कारण आम आदमी के लिए न्याय तक पहुंच आसान हो गई है। लेकिन यह तर्क पूरी तरह संतुलित नहीं लगता। तकनीकी सुविधाएं और संस्थागत ढांचे अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन क्या वे वास्तव में उस सामाजिक और आर्थिक असमानता को खत्म कर पाए हैं, जो आज भी बड़ी संख्या में लोगों को न्याय से दूर रखती है? क्या एक गरीब मजदूर, एक ग्रामीण महिला या एक हाशिए पर खड़ा समुदाय आज भी उतनी ही सहजता से अदालत तक पहुंच सकता है, जितना कागजों में दिखाया जाता है?
यह भी सही है कि कुछ मामलों में PIL का दुरुपयोग हुआ है। राजनीतिक या व्यक्तिगत एजेंडा चलाने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया गया है। लेकिन किसी व्यवस्था में खामियों के आधार पर उसे पूरी तरह समाप्त कर देना क्या उचित समाधान है? सुधार की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन सुधार और समाप्ति—दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। अगर दुरुपयोग हो रहा है, तो उसके लिए कड़े मानक तय किए जा सकते हैं, जुर्माना लगाया जा सकता है, या प्रारंभिक जांच की प्रक्रिया को और मजबूत किया जा सकता है। लेकिन पूरे सिस्टम को खत्म कर देना एक अत्यधिक कदम होगा।
यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू है—जवाबदेही। लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह निरंतर जवाबदेही की प्रक्रिया है। PIL इसी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। जब भी कार्यपालिका या प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से चूकता है, तो न्यायपालिका के माध्यम से उसे जवाबदेह ठहराने का रास्ता PIL ने ही खोला है। अगर यह रास्ता कमजोर होता है, तो सत्ता और जनता के बीच संतुलन भी प्रभावित होगा।
पिछले कुछ वर्षों में RTI कानून में किए गए बदलावों को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। सूचना आयुक्तों की स्वायत्तता को लेकर उठे सवालों ने पहले ही पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी थी। अब PIL पर उठे सवाल इस बहस को और गहरा कर रहे हैं। यह धारणा बन रही है कि जवाबदेही के औज़ार धीरे-धीरे कमजोर हो रहे हैं—और यही चिंता का विषय है।
हालांकि, इस पूरे मुद्दे को केवल टकराव के नजरिए से देखना भी सही नहीं होगा। यह जरूरी है कि एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाए। न्यायपालिका, कार्यपालिका और नागरिक समाज—तीनों को मिलकर यह तय करना होगा कि PIL को कैसे अधिक प्रभावी, पारदर्शी और जिम्मेदार बनाया जाए। सुधार की दिशा में कदम उठाना जरूरी है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि आम आदमी की आवाज़ कमजोर न पड़े।
जनहित याचिका केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का हिस्सा है। इसे खत्म करने के बजाय मजबूत करना समय की मांग है। अगर इस व्यवस्था में खामियां हैं, तो उन्हें दूर किया जाए, लेकिन उस पुल को तोड़ना समझदारी नहीं होगी, जो जनता और न्याय के बीच बना हुआ है। सवाल यह नहीं है कि PIL की जरूरत खत्म हो गई है या नहीं—सवाल यह है कि क्या हम उस व्यवस्था को बचाए रखना चाहते हैं, जो आम आदमी को न्याय के दरवाजे तक पहुंचने का हक देती है।




