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लोकतंत्र की आवाज़ या सत्ता की गूंज? हरिवंश की पुनर्नियुक्ति पर उठते सवाल

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ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 10 अप्रैल 2026

हरिवंश नारायण सिंह को एक बार फिर राज्यसभा के लिए नामित किया जाना केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान दिशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जब Droupadi Murmu जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद से यह निर्णय आता है, तो यह अपेक्षा की जाती है कि चयन निष्पक्षता, गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर हो। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हुआ है? राज्यसभा, जिसे देश की “उच्च सदन” कहा जाता है, केवल कानून बनाने की संस्था नहीं, विचारों के टकराव और संतुलन का मंच भी है। यहां सरकार और विपक्ष के बीच संवाद, बहस और असहमति ही लोकतंत्र की असली ताकत होती है। लेकिन बीते वर्षों में सदन के संचालन को लेकर जो तस्वीर सामने आई है, वह चिंताजनक है। आरोप बार-बार सामने आए हैं कि सदन के संचालन में निष्पक्षता की कमी रही। विपक्ष के नेताओं को बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया, महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा को सीमित किया गया और कई बार हंगामे के बीच विधेयक पारित कराए गए। यह सब तब हुआ जब सदन की अध्यक्षता ऐसे व्यक्ति के हाथ में थी, जिनसे निष्पक्षता की सर्वोच्च उम्मीद की जाती है।

लोकतंत्र में “चेयर” का पद किसी दल का प्रतिनिधि नहीं होता, बल्कि वह पूरे सदन का संरक्षक होता है। लेकिन जब वही चेयर पक्षपात के आरोपों से घिर जाए, तो यह केवल एक व्यक्ति का सवाल नहीं रह जाता—यह पूरे संसदीय ढांचे की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न बन जाता है।

हरिवंश जी का पत्रकारिता से राजनीति तक का सफर सम्मानजनक रहा है, लेकिन राज्यसभा के संचालन के दौरान उनकी भूमिका पर गंभीर आलोचनाएं हुई हैं। सत्ता पक्ष के प्रति झुकाव और विपक्ष के प्रति कठोरता की धारणा ने उनकी निष्पक्षता को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है। ऐसे में उनका पुनर्नियुक्त होना यह संदेश देता है कि शायद आज की राजनीति में निष्पक्षता से ज्यादा “अनुकूलता” को महत्व दिया जा रहा है।

यह भी सवाल उठता है कि क्या देश में ऐसे अन्य योग्य, निष्पक्ष और अनुभवी लोग नहीं थे, जिन्हें इस पद के लिए चुना जा सकता था? या फिर यह निर्णय एक राजनीतिक संदेश है—कि जो सत्ता के अनुकूल रहेगा, उसे ही पुरस्कृत किया जाएगा?

लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है, बल्कि संस्थाओं की निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है। अगर संसद के भीतर ही विपक्ष की आवाज़ दबाई जाएगी, तो यह लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करने जैसा होगा।

आज जरूरत है कि संसद के संचालन को लेकर एक नई सोच विकसित की जाए—जहां चेयर निष्पक्ष हो, सभी पक्षों को बराबरी का अवसर मिले और बहस को रोका नहीं, बल्कि प्रोत्साहित किया जाए।
हरिवंश की पुनर्नियुक्ति इस बहस को और तेज करेगी—क्या हम एक मजबूत लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं, या फिर केवल एकतरफा संवाद की ओर?

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