राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | बरेली/नई दिल्ली | 5 अप्रैल 2026
धार्मिक और राजनीतिक बयानबाजी के बीच एक बड़ा विवाद सामने आया है, जहां शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने Mohan Bhagwat के बयान पर तीखा सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि अगर समाज में हिंदुओं की संख्या बढ़ाने की बात की जा रही है, तो सबसे पहले खुद उदाहरण पेश किया जाना चाहिए। इसी दौरान उन्होंने सीधे तौर पर सवाल किया—“अगर यह इतना जरूरी है, तो भागवत खुद शादी करके बच्चे क्यों नहीं पैदा करते?”
यह पूरा विवाद दरअसल उस बयान से जुड़ा है, जिसमें संघ प्रमुख ने हिंदू समाज में अधिक बच्चों की बात कही थी। इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए शंकराचार्य ने कहा कि जो बात खुद नहीं कर सकते, उसका दबाव दूसरों पर नहीं डालना चाहिए। उनका कहना था कि समाज को दिशा देने वाले लोगों को पहले अपने जीवन में वही लागू करना चाहिए, जो वे दूसरों को सलाह देते हैं।
शंकराचार्य ने अपने बयान में सरकार और विचारधारा दोनों पर अप्रत्यक्ष निशाना साधते हुए यह भी कहा कि एक तरफ सरकार जनसंख्या नियंत्रण की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग जनसंख्या बढ़ाने की सलाह देते हैं—यह विरोधाभास जनता के बीच भ्रम पैदा करता है। उन्होंने इस मुद्दे को सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ते हुए कहा कि नेताओं को अपने शब्दों और कर्मों में एकरूपता रखनी चाहिए।
इस पूरे विवाद के बीच शंकराचार्य ने विपक्ष को लेकर भी साफ रुख रखा। उन्होंने कहा कि वे किसी एक राजनीतिक दल के साथ नहीं हैं। उनका स्पष्ट कहना था—“जो हमारी बात सुनेगा, हम उसके साथ खड़े रहेंगे।” खास तौर पर उन्होंने गो-रक्षा जैसे मुद्दों पर कानून बनाने की बात कही और संकेत दिया कि समर्थन विचारों के आधार पर होगा, न कि राजनीति के आधार पर।
यानी एक तरफ जहां उन्होंने Mohan Bhagwat के बयान पर सवाल उठाया, वहीं दूसरी तरफ यह भी साफ किया कि वे न सत्ता पक्ष के साथ बंधे हैं और न विपक्ष के। उनका रुख मुद्दा-आधारित समर्थन का है, जो मौजूदा राजनीति से अलग नजर आता है।
इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। कुछ लोग इसे सीधे तौर पर Rashtriya Swayamsevak Sangh की विचारधारा पर सवाल मान रहे हैं, तो कुछ इसे व्यक्तिगत टिप्पणी कहकर आलोचना कर रहे हैं। वहीं समर्थकों का कहना है कि यह एक वैचारिक बहस है, जिसमें “पहले खुद उदाहरण” देने की बात कही गई है।
फिलहाल Mohan Bhagwat या RSS की ओर से इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन इतना तय है कि यह बयान आने वाले दिनों में राजनीतिक और वैचारिक बहस को और तेज करेगा। यह विवाद सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि क्या समाज को दिशा देने वाले लोग खुद अपने विचारों पर अमल करते हैं या नहीं—और राजनीति में समर्थन विचारधारा से तय होगा या सुविधा से।




