राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | पटना | 5 अप्रैल 2026
लंबे शासन के बाद उठते बड़े सवाल
बिहार की राजनीति में करीब दो दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहे Nitish Kumar को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। 2005 से लेकर 2026 तक का लंबा कार्यकाल किसी भी नेता के लिए अपनी नीतियों और विकास मॉडल को साबित करने का पर्याप्त समय माना जाता है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इतने लंबे समय के बावजूद बिहार आज भी बुनियादी विकास के कई पैमानों पर पीछे खड़ा दिखाई देता है। यही वजह है कि “21 साल में उपलब्धि Zero” जैसी कड़ी टिप्पणी अब आम चर्चा का विषय बन गई है। यह सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं रह गया, बल्कि आम लोगों के बीच भी यह सवाल उठने लगा है कि आखिर इतने वर्षों में राज्य को क्या मिला और क्या अब भी अधूरा रह गया।
बुनियादी ढांचे की हकीकत और अधूरी तस्वीर
बिहार में विकास को लेकर सबसे बड़ा मुद्दा बुनियादी ढांचे का है। आलोचक बार-बार यह सवाल उठा रहे हैं कि इतने लंबे समय में राज्य को आधुनिक सुविधाओं से क्यों नहीं जोड़ा जा सका। एक भी अंतरराष्ट्रीय स्तर का एयरपोर्ट, एक्सप्रेसवे या बड़ा स्टेडियम न होना अक्सर चर्चा का विषय बनता है। कई राष्ट्रीय राजमार्ग आज भी पूरी तरह विकसित नहीं हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कें अब भी खराब हालत में देखी जाती हैं। यह भी कहा जाता है कि अगर सड़क, परिवहन और कनेक्टिविटी मजबूत नहीं होगी, तो निवेश और उद्योग अपने आप पीछे हट जाएंगे। यही कारण है कि बिहार में बड़े निवेश की कमी को सीधे तौर पर इस अधूरे ढांचे से जोड़ा जाता है।
शिक्षा और स्वास्थ्य—विकास की सबसे कमजोर कड़ी
राज्य की शिक्षा व्यवस्था को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी, शिक्षकों की अनुपस्थिति और गुणवत्ता की गिरावट जैसे मुद्दे बार-बार सामने आते रहे हैं। साक्षरता दर के मामले में भी बिहार देश के निचले राज्यों में गिना जाता है, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या शिक्षा को प्राथमिकता दी गई या नहीं। स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। ग्रामीण इलाकों में अस्पतालों की कमी, डॉक्टरों की अनुपलब्धता और इलाज की सीमित सुविधाएं लोगों को परेशान करती हैं। नतीजा यह होता है कि गंभीर बीमारी होने पर लोगों को दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है, जो आर्थिक और मानसिक दोनों तरह से भारी पड़ता है।
रोजगार की कमी और पलायन की मजबूरी
बिहार की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है रोजगार का अभाव और इसके कारण होने वाला पलायन। लाखों लोग हर साल काम की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर जाते हैं और वहीं मजदूरी या छोटे-मोटे काम करके अपना जीवन चलाते हैं। यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि राज्य के भीतर रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं बन पाए हैं। आलोचकों का कहना है कि अगर उद्योग, फैक्ट्री और IT सेक्टर का विकास होता, तो इतनी बड़ी संख्या में लोगों को बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। आज भी देश के लगभग हर बड़े शहर में बिहार के मजदूरों की मौजूदगी यह दिखाती है कि राज्य में आर्थिक गतिविधियां उस स्तर तक नहीं पहुंच पाई हैं, जहां लोगों को अपने घर के पास ही रोजगार मिल सके।
औद्योगिक विकास की धीमी रफ्तार और आर्थिक असर
औद्योगिक विकास के मामले में बिहार को अक्सर पिछड़े राज्यों में गिना जाता है। बड़े उद्योगों की कमी, IT पार्क और टेक्सटाइल पार्क जैसी परियोजनाओं का अभाव और निवेशकों की कम रुचि—ये सभी बातें इस बात की ओर इशारा करती हैं कि राज्य में औद्योगिक माहौल मजबूत नहीं बन पाया है। इसका सीधा असर राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। प्रति व्यक्ति आय के मामले में बिहार देश के सबसे निचले पायदान पर बना हुआ है, जिससे लोगों का जीवन स्तर भी प्रभावित होता है। आर्थिक मजबूती के बिना किसी भी राज्य का समग्र विकास संभव नहीं होता, और यही वह क्षेत्र है जहां बिहार को अभी लंबा सफर तय करना बाकी है।
सरकार की उपलब्धियां और उनका प्रभाव
हालांकि सरकार अपने कामों को लेकर अलग तस्वीर पेश करती है। Nitish Kumar के नेतृत्व में लड़कियों के लिए साइकिल और पोशाक योजना को एक बड़ी पहल माना गया, जिससे स्कूल जाने वाली छात्राओं की संख्या में वृद्धि हुई। इसके अलावा बिजली की उपलब्धता में सुधार और कुछ सड़कों का निर्माण भी सरकार अपनी उपलब्धियों में गिनाती है। सरकार का यह भी कहना है कि उसने उस बिहार को संभाला था जो पहले से ही बेहद पिछड़ा था, और अब स्थिति में धीरे-धीरे सुधार आया है। हालांकि आलोचकों का तर्क है कि ये सुधार बुनियादी हैं और इन्हें बड़े विकास की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
तुलना में पिछड़ता बिहार और बढ़ती असंतुष्टि
जब बिहार की तुलना देश के अन्य राज्यों से की जाती है, तो अंतर और साफ नजर आता है। कई राज्यों ने तेजी से एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर, आधुनिक शहर और उच्च स्तर की शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएं विकसित की हैं। इसके मुकाबले बिहार अब भी कई मामलों में पीछे दिखाई देता है। यही वजह है कि राज्य के भीतर असंतोष की भावना धीरे-धीरे बढ़ रही है और लोग अब ठोस बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं। “21 साल में उपलब्धि Zero” जैसे बयान इसी असंतोष को दर्शाते हैं, जो अब केवल राजनीतिक मंच तक सीमित नहीं रहा बल्कि आम चर्चा का हिस्सा बन चुका है।
सवालों के बीच खड़ा बिहार
बिहार की मौजूदा स्थिति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां विकास को लेकर दो अलग-अलग नजरिए साफ दिखाई देते हैं। एक तरफ सरकार अपने प्रयासों और सुधारों को उपलब्धि बता रही है, तो दूसरी तरफ आलोचक इसे अधूरा और अपर्याप्त मान रहे हैं। सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं छिपी है, लेकिन इतना जरूर है कि इतने लंबे कार्यकाल के बाद जनता की अपेक्षाएं बहुत बढ़ जाती हैं। आसान शब्दों में कहें तो—21 साल का समय किसी भी राज्य को बदलने के लिए काफी होता है, और अब यही सवाल सबसे बड़ा बन गया है कि बिहार ने इस समय का कितना सही उपयोग किया और कितना मौका खो दिया।




