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न्याय मिला, पर नैरेटिव क्यों गूंगा? हुड्डा को राहत पर चुप्पी और केजरीवाल को मसीहा बनाने का प्रोपेगेंडा : पवन खेड़ा

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राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | पंचकुला / नई दिल्ली | 4 अप्रैल 2026

पंचकुला की विशेष अदालत द्वारा हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा को एजेएल (AJL) जमीन पुनःआवंटन और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले में बड़ी राहत मिलने के बाद सियासत में नई बहस छिड़ गई है। अदालत के फैसले ने कांग्रेस को जहां एक तरह से राहत दी है, वहीं इस पूरे मामले की मीडिया कवरेज को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कांग्रेस इसे “सच की जीत” बता रही है, लेकिन पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा ने इसे केवल कानूनी जीत नहीं, बल्कि “नैरेटिव की लड़ाई” का हिस्सा बताया है।

पवन खेड़ा ने अपने बयान में हाल ही में अरविंद केजरीवाल को मिली राहत का जिक्र करते हुए मीडिया के रवैये पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि केजरीवाल के मामले में मुख्यधारा मीडिया ने तुरंत एक मजबूत माहौल तैयार किया, जिसमें उन्हें “संस्थागत प्रताड़ना का शिकार” और एक संघर्षशील नेता के रूप में पेश किया गया। लेकिन जब पंचकुला की अदालत ने हुड्डा को राहत दी, तो वही मीडिया लगभग खामोश दिखाई दिया। खेड़ा के अनुसार, यही दोहरा रवैया इस बात का संकेत है कि खबरों का मूल्यांकन अब निष्पक्षता के बजाय राजनीतिक सुविधा के आधार पर हो रहा है।

खेड़ा ने आरोप लगाया कि केजरीवाल को “मसीहा” के रूप में प्रस्तुत करना एक सुनियोजित प्रोपेगेंडा का हिस्सा था, जो सत्ताधारी राजनीति के अनुकूल बैठता है। वहीं जब बात हुड्डा और दिवंगत मोतीलाल वोरा की आती है, तो उसी तरह की सहानुभूति और विस्तार से चर्चा देखने को नहीं मिलती। उनके मुताबिक, यह चुप्पी इसलिए है क्योंकि इससे उस स्थापित नैरेटिव को झटका लगता है, जिसमें कांग्रेस नेताओं को लगातार संदेह के घेरे में दिखाया जाता रहा है।

मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो यह हरियाणा के पंचकुला में एक संस्थागत प्लॉट के पुनःआवंटन से जुड़ा था। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगाए थे और इसे एक बड़े घोटाले के रूप में प्रस्तुत किया गया था। लेकिन लंबी कानूनी प्रक्रिया और कई चरणों की सुनवाई के बाद अदालत ने पाया कि आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। इस फैसले ने न केवल हुड्डा को राहत दी, बल्कि जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी अप्रत्यक्ष रूप से सवाल खड़े कर दिए।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला अब सिर्फ एक कानूनी विवाद नहीं रहा, बल्कि यह “धारणा बनाम सच्चाई” की व्यापक बहस में बदल चुका है। एक तरफ कांग्रेस इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई का उदाहरण बता रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष और सत्ताधारी पक्ष अपनी-अपनी व्याख्याएं पेश कर रहे हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया की भूमिका केंद्र में आ गई है—क्या वह निष्पक्ष सूचनाकर्ता है या फिर किसी विशेष नैरेटिव को आगे बढ़ाने का माध्यम बनता जा रहा है?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि खबरें सिर्फ जानकारी नहीं देतीं, बल्कि समाज में धारणा भी बनाती हैं। अगर एक ही तरह के मामलों में अलग-अलग स्तर की कवरेज और संवेदनशीलता दिखाई जाती है, तो यह पत्रकारिता की विश्वसनीयता को कमजोर करता है और लोकतंत्र की पारदर्शिता पर असर डालता है।

अंततः बहस इसी बिंदु पर आकर ठहरती है—क्या न्याय केवल अदालत के फैसलों तक सीमित रह गया है, या उसे समाज और मीडिया में भी समान रूप से जगह मिलनी चाहिए? अगर न्याय की गूंज कहीं दब जाती है, तो क्या उसे पूर्ण न्याय कहा जा सकता है, या फिर वह भी एक अधूरी कहानी बनकर रह जाता है?

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