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CBSE का नया करिकुलम: कक्षा 6 से थर्ड लैंग्वेज अनिवार्य, अब छात्रों को पढ़नी होंगी तीन भाषाएं

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शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 अप्रैल 2026

नई शिक्षा नीति का असर: भाषा शिक्षा में बड़ा बदलाव

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE ने अपने नए करिकुलम में बड़ा बदलाव करते हुए कक्षा 6 से तीसरी भाषा को अनिवार्य कर दिया है। यह कदम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत उठाया गया है, जिसका उद्देश्य शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, समावेशी और बहुआयामी बनाना है। अब तक अधिकतर स्कूलों में दो भाषाएं पढ़ाई जाती थीं, लेकिन नए नियम लागू होने के बाद छात्रों को तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा। यह बदलाव केवल एक शैक्षणिक निर्णय नहीं, बल्कि देश की भाषाई विविधता को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो आने वाले समय में छात्रों के व्यक्तित्व और सोच पर गहरा असर डालेगा।

तीन भाषाओं का फॉर्मूला: R1, R2 और R3 की नई व्यवस्था

CBSE के नए ढांचे के अनुसार अब भाषा शिक्षा को R1, R2 और R3 के रूप में व्यवस्थित किया गया है, जिसमें छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी और इनमें से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होना अनिवार्य होगा। तीसरी भाषा यानी R3 की शुरुआत कक्षा 6 से होगी और इसे आगे की कक्षाओं में भी जारी रखना होगा। इस व्यवस्था के पीछे सोच यह है कि बच्चे न सिर्फ अपनी मातृभाषा बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं और संस्कृतियों से भी परिचित हों। इससे छात्रों में संवाद कौशल बढ़ेगा, समझ का दायरा विस्तृत होगा और वे बहुभाषी बनने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। खास बात यह है कि यह सिस्टम छात्रों को केवल भाषा सिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके बौद्धिक विकास और सांस्कृतिक जुड़ाव को भी मजबूत करता है।

अंग्रेजी की भूमिका और विकल्पों का विस्तार

नए करिकुलम में अंग्रेजी की भूमिका को लेकर भी लचीलापन रखा गया है। अंग्रेजी को तीसरी भाषा यानी R3 के रूप में शामिल किया जा सकता है, लेकिन इसके साथ ही स्कूलों को अन्य भारतीय भाषाओं के विकल्प भी देने होंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि अब छात्र केवल हिंदी और अंग्रेजी तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वे तमिल, तेलुगु, बंगाली, मराठी, गुजराती जैसी अन्य भाषाओं को भी सीख सकेंगे। यह बदलाव भारत की सांस्कृतिक विविधता को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास है। साथ ही, इससे उन छात्रों को भी लाभ मिलेगा जो अलग-अलग राज्यों में रहते हैं या जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बहुभाषी है। यह पहल छात्रों को एक व्यापक दृष्टिकोण देने और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अधिक सक्षम बनाने की दिशा में अहम मानी जा रही है।

कक्षा 9 तक प्रभाव: अब भाषा में पास होना भी जरूरी

इस नए सिस्टम का प्रभाव केवल कक्षा 6 तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आगे की कक्षाओं, खासकर कक्षा 9 तक भी इसका असर देखने को मिलेगा। अब छात्रों को तीनों भाषाओं में पढ़ाई करने के साथ-साथ उनमें पास होना भी अनिवार्य होगा। यानी भाषा अब केवल औपचारिक विषय नहीं रहेगी, बल्कि परीक्षा और परिणाम में इसकी सीधी भूमिका होगी। इससे छात्रों को भाषाओं को गंभीरता से लेना पड़ेगा और उनकी पकड़ मजबूत करनी होगी। यह बदलाव उन छात्रों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है जो पहले भाषा विषयों को हल्के में लेते थे, लेकिन लंबे समय में यह उनके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

कक्षा 9 में नए विकल्प: मैथ्स और साइंस के दो स्तर

CBSE ने केवल भाषा में ही नहीं, बल्कि कक्षा 9 के अन्य विषयों में भी बदलाव किए हैं। अब गणित और विज्ञान को दो स्तरों में पढ़ाने की योजना है, ताकि छात्र अपनी क्षमता और रुचि के अनुसार विषय चुन सकें। इसका उद्देश्य यह है कि हर छात्र को एक ही स्तर पर नहीं आंका जाए, बल्कि उसकी समझ और योग्यता के अनुसार उसे सीखने का मौका मिले। इससे पढ़ाई का दबाव कम होगा और छात्र अपनी रुचि के अनुसार बेहतर प्रदर्शन कर सकेंगे। यह बदलाव शिक्षा को अधिक छात्र-केंद्रित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

छात्रों और अभिभावकों पर असर: अवसर भी, चुनौती भी

इस नए करिकुलम का असर छात्रों और अभिभावकों दोनों पर पड़ेगा। जहां एक ओर छात्रों को अब अधिक मेहनत करनी होगी और तीन भाषाओं के साथ संतुलन बनाना होगा, वहीं दूसरी ओर यह उन्हें भविष्य के लिए अधिक तैयार भी करेगा। अभिभावकों को भी बच्चों की पढ़ाई में ज्यादा ध्यान देना होगा, खासकर भाषा विषयों में। हालांकि शुरुआत में यह बदलाव थोड़ा कठिन लग सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे छात्रों का समग्र विकास होगा और वे वैश्विक स्तर पर भी प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनेंगे।इस तरह CBSE का यह नया करिकुलम केवल एक बदलाव नहीं, बल्कि शिक्षा के पूरे दृष्टिकोण को बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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