राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 अप्रैल 2026
देश में सोशल मीडिया पर बढ़ती टेकडाउन कार्रवाई को लेकर अब सीधा टकराव शुरू हो गया है। Press Club of India ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए इसे “मनमाना, असंवैधानिक और खतरनाक ट्रेंड” करार दिया है। प्रेस क्लब ने साफ कहा है कि सरकार आलोचनात्मक आवाज़ों को दबाने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर रही है।
जारी प्रेस रिलीज़ में प्रेस क्लब ने आरोप लगाया कि हाल के दिनों में जिस तरह सरकार के खिलाफ लिखने या बोलने वालों के कंटेंट हटाए जा रहे हैं और अकाउंट ब्लॉक किए जा रहे हैं, वह सीधे तौर पर लोकतंत्र की जड़ों पर हमला है। संगठन ने चेतावनी दी कि अगर यही हाल रहा, तो देश में “डिजिटल इमरजेंसी” जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।
प्रेस क्लब ने दो टूक कहा कि यह कार्रवाई भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) का खुला उल्लंघन है, जो हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। Supreme Court of India के ऐतिहासिक श्रेय सिंघल बनाम भारत संघ फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि अदालत पहले ही ऐसे अस्पष्ट और मनमाने प्रावधानों को खारिज कर चुकी है— फिर भी सरकार उसी राह पर चल रही है।
बयान में यह भी खुलासा किया गया कि फेसबुक और X (पूर्व ट्विटर) पर कई बड़े अकाउंट्स और पेजों को निशाना बनाया गया। फैक्ट-चेकर मोहम्मद जुबैर, मोलिटिक्स, नेशनल दस्तक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर कार्रवाई को प्रेस क्लब ने “चुनिंदा टारगेटिंग” बताया है। मार्च में 4PM न्यूज के यूट्यूब चैनल पर हुई कार्रवाई को भी इसी कड़ी का हिस्सा बताया गया।
सबसे बड़ा सवाल उठाते हुए प्रेस क्लब ने कहा कि आखिर इन टेकडाउन आदेशों का आधार क्या है? क्यों न तो कोई स्पष्ट कारण बताया जाता है और न ही कोई पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाती है? सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के आदेशों के तहत हो रही इन कार्रवाइयों को “बिना जवाबदेही की सेंसरशिप” बताया गया है।
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की मैनेजिंग कमेटी ने सरकार को सीधी चेतावनी देते हुए कहा है कि पत्रकारों और नागरिकों की आवाज़ दबाने की कोशिशें अब बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। उन्होंने मांग की है कि सभी टेकडाउन आदेशों को सार्वजनिक किया जाए, स्पष्ट कारण बताए जाएं और इस पूरे सिस्टम को जवाबदेह बनाया जाए।
इस विवाद ने देश में एक बड़े सवाल को जन्म दे दिया है— क्या डिजिटल इंडिया अब “कंट्रोल्ड इंडिया” बनता जा रहा है? क्या सरकार आलोचना से डरकर उसे खत्म करने में जुटी है?यह मामला सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब यह लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों की सीधी लड़ाई बनता जा रहा है।




