राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 अप्रैल 2026
चुनावी पारदर्शिता, EVM और संस्थाओं की भूमिका पर फिर उठे गंभीर सवाल
लोकसभा चुनाव के परिणामों को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है, जब वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति परकला प्रभाकर ने सार्वजनिक रूप से यह दावा किया कि यदि चुनाव में कथित तौर पर गड़बड़ी नहीं हुई होती, तो INDIA गठबंधन को 316 सीटें हासिल हो सकती थीं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब पहले से ही विपक्षी दल चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की विश्वसनीयता और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते रहे हैं। प्रभाकर के इस बयान ने उन तमाम आरोपों को एक नई धार दे दी है, जिन्हें अब तक विपक्ष राजनीतिक बयानबाज़ी के तौर पर पेश करता रहा था। परकला प्रभाकर ने अपने बयान में सीधे तौर पर किसी संस्था या प्रक्रिया का नाम तो नहीं लिया, लेकिन “गड़बड़ी” शब्द के इस्तेमाल ने कई तरह की आशंकाओं को जन्म दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह इशारा चुनावी प्रबंधन, मतगणना प्रक्रिया या फिर EVM के उपयोग से जुड़े विवादों की ओर हो सकता है। गौरतलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भी कई विपक्षी दलों—खासतौर पर कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी—ने EVM में छेड़छाड़ की आशंका जताई थी और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग उठाई थी। हालांकि, चुनाव आयोग ने हर बार इन आरोपों को खारिज करते हुए EVM प्रणाली को पूरी तरह सुरक्षित और पारदर्शी बताया है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यह बयान किसी विपक्षी नेता का नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ सरकार के शीर्ष स्तर से जुड़े एक व्यक्ति का है। यही कारण है कि भाजपा के लिए यह स्थिति असहज मानी जा रही है। पार्टी के भीतर इसे “व्यक्तिगत राय” बताकर सीमित करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन राजनीतिक तौर पर यह बयान विपक्ष के लिए एक मजबूत हथियार बन गया है। विपक्षी नेताओं ने तुरंत इस बयान को लपकते हुए कहा कि अब “सत्ता के भीतर से ही सच्चाई सामने आ रही है” और चुनावी प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
चुनावी आंकड़ों और राजनीतिक समीकरणों पर नजर डालें तो INDIA गठबंधन ने कई राज्यों में अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया था, लेकिन सत्ता से दूर रह गया। ऐसे में 316 सीटों का दावा केवल एक अनुमान है या किसी ठोस विश्लेषण पर आधारित—यह भी एक बड़ा सवाल है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह दावा किसी विस्तृत डेटा, बूथ स्तर के विश्लेषण या मतदान पैटर्न के अध्ययन पर आधारित है, तो इसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि पारदर्शिता बनी रहे। वहीं, अगर यह केवल एक राजनीतिक आकलन है, तो इसे उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
इस बयान के बाद एक बार फिर चुनाव आयोग की भूमिका और विश्वसनीयता पर बहस तेज हो गई है। Election Commission of India पर पहले भी निष्पक्षता को लेकर आरोप लगते रहे हैं, लेकिन हर बार आयोग ने अपने कामकाज को संविधान के दायरे में पूरी ईमानदारी से करने की बात दोहराई है। अब देखना यह होगा कि क्या आयोग इस बयान पर कोई प्रतिक्रिया देता है या इसे नजरअंदाज करता है। साथ ही, क्या विपक्ष इस मुद्दे को लेकर संसद से लेकर सड़कों तक आंदोलन तेज करेगा, यह भी आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा।
परकला प्रभाकर का यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं रह गया है, बल्कि इसने चुनावी प्रणाली की विश्वसनीयता, लोकतंत्र की मजबूती और संस्थाओं की निष्पक्षता पर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले समय में यह मुद्दा और कितना तूल पकड़ता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या इस पर ठोस तथ्य सामने आते हैं या फिर यह भी भारतीय राजनीति के अन्य विवादों की तरह आरोप-प्रत्यारोप के शोर में दबकर रह जाता है।




