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इजराइल के समर्थन पर भारत सरकार घिरी, ताकत के आगे घुटने टेकने वाली रीढ़विहीन विदेश नीति

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राष्ट्रीय/ ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 28 मार्च 2026

मध्य पूर्व में जारी भीषण संघर्ष ने सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति को नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। प्रधानमंत्री Narendra Modi की सरकार जिस तरह खुलकर Israel के समर्थन में खड़ी नजर आई और Iran पर हुए हमलों की स्पष्ट निंदा से बचती रही, उसने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या भारत अब सिद्धांतों से नहीं, बल्कि ताकत के समीकरणों से अपनी विदेश नीति तय कर रहा है? भारत की पहचान लंबे समय तक एक संतुलित, स्वतंत्र और नैतिक कूटनीतिक आवाज के रूप में रही है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन से लेकर पश्चिम और पूर्व के बीच संतुलन साधने तक, भारत ने हमेशा यह संदेश दिया कि वह किसी शक्ति-गुट का हिस्सा नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र धुरी है। लेकिन मौजूदा रुख इस परंपरा से अलग दिखाई देता है। Narendra Modi का इजराइल के प्रति “पूरी मजबूती” से खड़े होने का बयान और उसके तुरंत बाद अमेरिका-इजराइल की सैन्य कार्रवाई पर चुप्पी—यह महज संयोग नहीं, बल्कि नीति का संकेत लगता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सैकड़ों लोगों की जान जाती है, जब एक संप्रभु देश पर हमला होता है, तब भारत की आवाज क्यों नहीं उठती? सरकार “चिंता” और “संयम” जैसे शब्दों के पीछे छिपती दिखती है, लेकिन क्या यह पर्याप्त है? क्या दुनिया भारत से सिर्फ संतुलित शब्दों की उम्मीद करती है, या एक स्पष्ट नैतिक रुख की भी?

विपक्ष का आरोप है कि यह चुप्पी नहीं, बल्कि झुकाव है—और वह भी ताकतवर देशों की ओर। कांग्रेस समेत कई दलों ने इसे भारत की पारंपरिक विदेश नीति से विचलन बताया है। उनका कहना है कि भारत, जो कभी विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ की आवाज बनकर उभरता था, अब एक पक्ष के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है। यह सिर्फ राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि उस छवि का सवाल है जिसे भारत ने दशकों में बनाया था।

कई सेवानिवृत्त राजनयिक भी इस रुख पर सवाल उठा रहे हैं। उनका मानना है कि कूटनीति केवल हितों का खेल नहीं होती, उसमें नैतिकता और विश्वसनीयता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। अगर भारत हर बार ताकतवर देशों के साथ खड़ा दिखेगा, तो वह कमजोर और विकासशील देशों के बीच अपनी साख कैसे बनाए रखेगा? और क्या ऐसे में वह वास्तव में “विश्वगुरु” बनने का दावा कर सकता है?

सरकार का तर्क है कि भारत एक जटिल भू-राजनीतिक स्थिति में है—एक तरफ इजराइल के साथ मजबूत होते रक्षा संबंध, दूसरी तरफ ईरान के साथ ऊर्जा और रणनीतिक जुड़ाव। लेकिन सवाल यह है कि क्या संतुलन का मतलब चुप्पी है? क्या संतुलन का अर्थ यह है कि अन्याय पर भी स्पष्ट शब्दों से बचा जाए?

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि भारत की विदेश नीति हमेशा “रणनीतिक स्वायत्तता” (Strategic Autonomy) पर आधारित रही है। लेकिन अगर निर्णय ताकत के दबाव में लिए जाते दिखें, तो यह स्वायत्तता सवालों के घेरे में आ जाती है। आलोचकों का कहना है कि यह “प्रैग्मेटिक” नहीं, बल्कि “रीढ़विहीन” कूटनीति का संकेत है—जहां सिद्धांतों की जगह सुविधाजनक चुप्पी ले लेती है।

यह विवाद केवल एक घटना या बयान तक सीमित नहीं है। यह उस बड़े सवाल को जन्म देता है कि भारत किस दिशा में जा रहा है—क्या वह अपनी स्वतंत्र आवाज बनाए रखेगा या फिर वैश्विक ताकतों के बीच संतुलन के नाम पर अपनी पहचान खो देगा?

विदेश नीति केवल सरकारों का विषय नहीं होती, यह देश की आत्मा और उसकी वैश्विक पहचान का प्रतिबिंब होती है। अगर भारत अपनी आवाज खो देता है, तो वह सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि एक विचार भी खो देगा। और शायद यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा खतरा है।

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