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नए भारत का फॉर्मूला: अतीत को कोसो, भविष्य बेचो, आज भूल कर 2047 का झुनझुना बजाओ

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ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 28 मार्च 2026

बीजेपी वाले आजकल किसी ज्योतिषी से बिल्कुल कम नहीं लगते। ज्योतिषी क्या करता है? वह आपके अतीत की धुंधली कहानी सुनाकर आपको भावुक कर देता है—“बचपन में कोई बड़ी घटना हुई थी जिसने जीवन बदल दिया”—और फिर भविष्य का सुनहरा सपना बेचता है—“आने वाले समय में बड़ा बदलाव होगा, सब कुछ ठीक हो जाएगा”। लेकिन वर्तमान की सच्चाई? उस पर उसकी जुबान बंद हो जाती है। ठीक यही खेल बीजेपी की राजनीति में चल रहा है। या तो 1947 की आजादी और नेहरू-कांग्रेस की गलतियों का रोना रोया जाता है, या फिर 2047 के विकसित भारत का बड़ा-बड़ा सपना दिखाया जाता है। 2026 की हकीकत, जनता की रोजमर्रा की तकलीफें, महंगाई की मार, बेरोजगारी की आग और स्वास्थ्य-शिक्षा की बदहाली पर पूर्ण खामोशी साध ली जाती है।

जब देश में महंगाई आसमान छू रही है, तो जवाब मिलता है—नेहरू की गलती। बेरोजगारी युवाओं को चरम पर ले जा रही है, तो दोषी फिर वही नेहरू और उनकी कांग्रेस। इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी दिखे तो तुरंत “70 साल में कुछ नहीं हुआ” का पुराना राग अलाप दिया जाता है। अरे भाई, अगर 70 साल में सचमुच कुछ नहीं हुआ था, तो फिर बीजेपी वाले उन नेहरू-काल के बने संस्थानों, बैंकों, रेलवे, बिजली घरों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को पिछले 12 साल से बेच-बेच कर क्यों अपनी तिजोरी भर रही है? यह तो ठीक उसी नालायक बेटे जैसा व्यवहार है जो बाप-दादा की कमाई हुई संपत्ति को बेच-बेचकर ऐश करता है और फिर दावा करता है कि उसके पूर्वजों ने कुछ भी नहीं बनाया। अपराध बढ़ रहा है, कानून-व्यवस्था चरमरा रही है, तो जवाब फिर वही—नेहरू की विरासत। सरकार कोई ठोस काम क्यों नहीं कर पा रही, इसका भी ठीकरा उसी नेहरू के सिर फोड़ा जाता है, जैसे मोदी जी को काम करने से नेहरू हाथ पकड़कर रोक लेते हों।

एपिस्टीन फाइल हो या कोई और विवाद, हर जगह नेहरू को घसीट लाया जाता है। क्या नेहरू उन्हें गोदी में लेकर वहां ले गए थे? या कान पकड़कर मजबूर किया था? हैरानी की बात यह है कि ये सारी बातें वही लोग कर रहे हैं जो खुद नेहरू के बनवाए स्कूलों-कॉलेजों में पढ़े, उसी व्यवस्था के अस्पतालों में इलाज कराते हैं और उसी ढांचे पर टिके हुए आराम की जिंदगी जी रहे हैं। जब कोई सवाल वर्तमान का करता है, तो तुरंत एक नया झुनझुना थमा दिया जाता है—“2047 का विकसित भारत”। मतलब साफ है—आज की परेशानियां झेलो, महंगाई सही लो, बेरोजगारी में घुटते रहो, लेकिन चुपचाप 21 साल बाद के सपने में उलझे रहो। आज हवा खाओ, धूप-धूल सहो, और इंतजार करो कि 2047 में सब जादू की तरह ठीक हो जाएगा।

और अगर 2047 आ गया और चीजें नहीं सुधरीं, तो क्या होगा? फिर नया टारगेट दे दिया जाएगा—3047 का विकसित भारत! गोलपोस्ट बदलने की यह राजनीति कब तक चलेगी? देश को इतिहास की अनंत बहस और भविष्य के अनगिनत वादों की नहीं, बल्कि आज के ठोस जवाबों की जरूरत है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महंगाई और सुरक्षा—ये सवाल आज के हैं, कल के नहीं। जनता को रोजगार चाहिए आज, सस्ती दवाइयां और अच्छा इलाज चाहिए आज, शिक्षा का अधिकार चाहिए आज। लेकिन बीजेपी और संघ की राजनीति तो ज्योतिष की तरह ही है—अतीत को कोसो, भविष्य का सपना बेचो, और वर्तमान की जिम्मेदारी से बचते रहो।

आखिर कब तक जनता इस ज्योतिषी वाली राजनीति का शिकार बनी रहेगी? कब तक “अभी नहीं, 2047 में” का राग अलापा जाएगा? देश को जुमलों और झुनझुनों की नहीं, बल्कि वास्तविक काम, जवाबदेही और आज की समस्याओं के समाधान की जरूरत है। वरना यह सिलसिला चलता रहेगा—1947 को कोसो, 2047 का सपना दिखाओ, और 2026 की हकीकत को अनदेखा कर दो। बीजेपी वाले सचमुच किसी ज्योतिष से कम नहीं—सिर्फ कुंडली की जगह वोट बैंक देखते हैं, और समाधान की जगह नया सपना बेचते हैं।

जनता अब जाग चुकी है। अब सिर्फ अतीत की बहस और भविष्य के सपनों से काम नहीं चलेगा। आज के सवालों के आज ही जवाब चाहिए। लेकिन बीजेपी और नरेंद्र मोदी ने इन सवालों का भी काट निकाला हुआ है। जो सवाल पूछे वो देशद्रोही है। कभी कोई पत्रकार, तो कभी कोई इतिहासकार तो कभी कोई व्यंग्यकार तो कभी कोई समाजसेवी तो कभी कोई पर्यावरणविद देश द्रोही बना कर जेल में ठूंस दिया जाता है।

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