ओपिनियन | गुंजन सिंहा, वरिष्ठ पत्रकार | नई दिल्ली | 28 मार्च 2026
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Ismail Baghaei ने हाल ही में एक ऐसा बयान दिया, जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की परतों को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने सीधे तौर पर United Nations के महासचिव Antonio Guterres की उस चिंता को खारिज कर दिया, जिसमें वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों की बात की गई थी। बकाई का जवाब सिर्फ एक प्रतिक्रिया नहीं था, बल्कि एक सख्त संदेश था—कि जब ज़मीन पर लोग मर रहे हों, तब आर्थिक संतुलन की चिंता नैतिक रूप से खोखली लगती है। उनका स्पष्ट कहना था कि जब तक ईरान के बच्चे मलबे के नीचे दबे हैं, तब तक इस तरह की “संतुलित भाषा” स्वीकार्य नहीं हो सकती।
गुटेरेस का बयान वही पारंपरिक कूटनीतिक शैली लिए हुए था—ऐसी भाषा, जो संतुलन बनाए रखने के नाम पर अक्सर वास्तविकता को धुंधला कर देती है। उन्होंने वैश्विक अस्थिरता और आर्थिक असर की बात की, लेकिन यह नहीं बताया कि इस अस्थिरता की जड़ क्या है और जिम्मेदार कौन है। इसके विपरीत, बकाई ने बिना लाग-लपेट के कहा कि यह कोई “संघर्ष” नहीं, बल्कि दो परमाणु-हथियार संपन्न देशों द्वारा Iran पर किया गया “बिना उकसावे का आक्रमण” है। यह शब्दावली सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर नैरेटिव को चुनौती देने की कोशिश है।
सबसे ज्यादा चुभने वाला पहलू वह है, जिसे शायद वैश्विक मंचों पर नजरअंदाज किया जा रहा है। गुटेरेस ने आर्थिक अस्थिरता की बात की—लेकिन बकाई ने सवाल उठाया कि उन निर्दोष नागरिकों का क्या, जिनमें मिनाब जैसे इलाकों में मारे गए मासूम बच्चे भी शामिल हैं। जब आंकड़ों में “175 बच्चे” जैसी संख्या सामने आती है, तो वह सिर्फ आंकड़ा नहीं रहता—वह पूरी व्यवस्था पर सवाल बन जाता है। और यहीं से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नैतिकता पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है—क्या वैश्विक संस्थाएं इंसानी जिंदगियों से ज्यादा बाजारों की चिंता करती हैं?
इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—समय। बकाई ने याद दिलाया कि यह हमला ऐसे वक्त हुआ जब Iran और United States के बीच कूटनीतिक वार्ता चल रही थी। यानी बातचीत के बीच हमला हुआ—जो सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि विश्वास और कूटनीति दोनों के लिए झटका है। अगर यह आरोप सही हैं, तो यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मूल सिद्धांत—विश्वास और संवाद—पर सीधा आघात है। लेकिन इसके बावजूद, वैश्विक मंचों पर प्राथमिक चिंता “अर्थव्यवस्था” बनी हुई है।
ईरान की प्रतिक्रिया भी पारंपरिक कूटनीति से अलग रही। उसने सिर्फ निंदा या अपील तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि सैन्य जवाब दिया। मिसाइलों और ड्रोन के जरिए उसने यह संकेत दिया कि वह आक्रमण को एकतरफा नहीं रहने देगा। यह रुख अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए एक संदेश भी है—कि यदि वैश्विक संस्थाएं निष्पक्ष नहीं रहेंगी, तो देश अपने स्तर पर जवाब देने के लिए मजबूर होंगे।
यहां सबसे बड़ा सवाल United Nations की भूमिका को लेकर उठता है। क्या यह संस्था वास्तव में निष्पक्ष मध्यस्थ है, या फिर शक्तिशाली देशों के प्रभाव में काम करने वाला मंच बनती जा रही है? बकाई ने महासचिव को याद दिलाया कि संयुक्त राष्ट्र का मूल उद्देश्य आक्रमण रोकना, निर्दोषों की रक्षा करना और जिम्मेदारों को जवाबदेह बनाना है। लेकिन व्यवहार में अक्सर यह देखा जाता है कि जब ताकतवर देश शामिल होते हैं, तो भाषा नरम हो जाती है और कार्रवाई सीमित।
दोहरे मापदंड का आरोप नया नहीं है, लेकिन इस बार यह और स्पष्ट रूप से सामने आया है। अगर यही कार्रवाई उल्टी दिशा में होती—यानी ईरान किसी पश्चिमी देश पर वार्ता के दौरान हमला करता—तो प्रतिक्रिया कहीं अधिक तीखी होती। आपात बैठकें, कड़े प्रस्ताव और अंतरराष्ट्रीय दबाव—सब कुछ तुरंत सक्रिय हो जाता। लेकिन जब आरोप अमेरिका या इज़राइल पर हों, तो बयान संतुलित और अस्पष्ट हो जाते हैं।
निष्कर्ष स्पष्ट है—आज की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उसकी विश्वसनीयता दांव पर है। Iran की प्रतिक्रिया को केवल आक्रामकता के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा; इसे उस असंतुलन के परिणाम के रूप में भी समझना होगा, जो वैश्विक संस्थाओं की निष्क्रियता से पैदा होता है। संयुक्त राष्ट्र अगर अपनी भूमिका को पुनः परिभाषित नहीं करता, तो वह उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाएगा, जिसे संतुलित करने के लिए उसकी स्थापना हुई थी।
आखिर में सवाल वही है—क्या दुनिया नियमों से चलेगी या ताकत से? अगर जवाब ताकत है, तो फिर कूटनीति सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह जाएगी। और अगर जवाब न्याय है, तो फिर हर आवाज़—चाहे वह कितनी भी असहज क्यों न हो—सुनी जानी चाहिए।




