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‘व्यापम घोटाला: मोहरे सज़ा पाए, लेकिन असली खिलाड़ी अब भी सुरक्षित?’

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अपराध / राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | भोपाल/दिल्ली | 27 मार्च 2026

मध्य प्रदेश के बहुचर्चित व्यापम घोटाले को लेकर एक बार फिर देश की राजनीति और न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वर्षों पहले उजागर हुआ यह घोटाला आज भी पूरी तरह अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सका है। हालिया विश्लेषण और चर्चाओं में यह बात प्रमुखता से सामने आ रही है कि इस मामले में जहां छोटे स्तर के आरोपी—जिन्हें अक्सर “मोहरे” कहा जाता है—सज़ा पा रहे हैं, वहीं कथित तौर पर बड़े और प्रभावशाली लोग अब भी कानून की पकड़ से दूर दिखाई देते हैं। यही कारण है कि यह घोटाला केवल एक अपराध की कहानी नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यप्रणाली पर भी गहरा सवाल बन गया है।

व्यापम, यानी व्यावसायिक परीक्षा मंडल, के जरिए मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों की भर्ती में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का खुलासा हुआ था। जांच में सामने आया कि पैसे लेकर फर्जी उम्मीदवारों को परीक्षा दिलवाना, उत्तर पुस्तिकाओं में हेरफेर करना, और मेरिट सूची में बदलाव जैसे संगठित अपराध इस नेटवर्क का हिस्सा थे। यह कोई साधारण गड़बड़ी नहीं थी, बल्कि एक ऐसा जाल था जिसमें दलाल, अभ्यर्थी, अधिकारी और कई प्रभावशाली कड़ियां शामिल बताई गईं।

पिछले कुछ वर्षों में अदालतों ने कई मामलों में दोषियों को सज़ा सुनाई है। इन सज़ाओं में अधिकतर वे लोग शामिल हैं जो सीधे तौर पर परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी करते पकड़े गए—जैसे ‘सॉल्वर गैंग’ के सदस्य, फर्जी परीक्षार्थी या स्थानीय स्तर के एजेंट। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल इन्हीं लोगों को दोषी मान लेना पर्याप्त है? क्या इस पूरे तंत्र को संचालित करने वाले बड़े चेहरे, जिन पर लंबे समय से आरोप लगते रहे, वास्तव में जांच के दायरे में आए भी या नहीं—यह अब भी एक बड़ा प्रश्न बना हुआ है।

इस घोटाले से जुड़ा सबसे चिंताजनक पहलू उन संदिग्ध मौतों का सिलसिला रहा, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। जांच के दौरान कई गवाहों, आरोपियों और इससे जुड़े लोगों की असामान्य परिस्थितियों में मौत हुई, जिससे मामले की गंभीरता और बढ़ गई। इन घटनाओं ने न केवल जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए, बल्कि यह भी संकेत दिया कि मामला कहीं अधिक गहराई और संवेदनशीलता से जुड़ा हुआ हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इस पूरे मामले की जांच केंद्रीय एजेंसी को सौंप दी गई थी, जिससे लोगों को उम्मीद थी कि अब सच पूरी तरह सामने आएगा। हालांकि, समय के साथ यह धारणा बनती गई कि जांच की रफ्तार और दायरा उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया, जिसकी अपेक्षा की जा रही थी। कई महत्वपूर्ण कड़ियां या तो कमजोर पड़ गईं या फिर आगे नहीं बढ़ सकीं, जिससे संदेह और गहरा हो गया।

आज व्यापम घोटाला केवल एक कानूनी मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक व्यापक बहस का विषय बन चुका है—क्या भारत में बड़े घोटालों में जिम्मेदारी तय करने का तरीका अधूरा है? क्या सिस्टम छोटे दोषियों को सज़ा देकर बड़े स्तर की जवाबदेही से बच निकलता है? यह सवाल न केवल इस मामले तक सीमित है, बल्कि देश की न्यायिक और प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी सीधा असर डालता है।

इस पूरे प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब तक किसी भी घोटाले की जांच उसके अंतिम छोर तक नहीं पहुंचती और हर स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक न्याय अधूरा ही माना जाएगा। व्यापम का मामला आज भी उसी अधूरे न्याय का प्रतीक बना हुआ है, जहां “मोहरे” तो हार गए, लेकिन “बादशाह” अब भी सुरक्षित नजर आते हैं।

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