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अंधेर नगरी चौपट राजा : केरल में “चुनाव आयोग” का पत्र पर “BJP की मुहर”… क्या अब कुछ बचा है गठबंधन पर बोलने के लिए?

ओपिनियन/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | 23 मार्च 2026

एक दस्तावेज, कई सवाल—मामला सिर्फ मुहर का नहीं, भरोसे का है

केरल में चुनावी माहौल पहले ही गर्म था, लेकिन एक कागज ने आग में घी डालने का काम कर दिया। भारत निर्वाचन आयोग के एक पत्र पर भारतीय जनता पार्टी की मुहर दिखी—और देखते ही देखते मामला तकनीकी गलती से निकलकर राजनीतिक भूचाल बन गया। सवाल यह नहीं है कि मुहर कैसे लगी, सवाल यह है कि जिस संस्था पर चुनाव की निष्पक्षता टिकी है, उस पर शक की एक रेखा भी क्यों आई? लोकतंत्र में भरोसा कांच जैसा होता है—एक बार दरार आई, तो आवाज दूर तक जाती है।

विपक्ष की राजनीति या असली चिंता?

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) और कांग्रेस ने इस मुद्दे को तुरंत लपक लिया। तंज भी आया, सवाल भी आए और आरोप भी। लेकिन यहां एक सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता—विपक्ष का काम ही सवाल उठाना है। अगर चुनाव आयोग जैसे संस्थान पर भी सवाल नहीं उठेंगे, तो फिर किस पर उठेंगे? हां, यह भी उतना ही सच है कि चुनाव के समय हर मुद्दा थोड़ा ज्यादा “बड़ा” बना दिया जाता है। यानी राजनीति भी है और चिंता भी—दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।

‘क्लेरिकल एरर’—छोटी गलती या बड़ी लापरवाही?

केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने साफ कहा—यह सिर्फ एक “क्लेरिकल एरर” है। एक मुहर लगी कॉपी गलती से स्कैन होकर आगे चली गई। सुनने में यह बात सीधी लगती है, लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होते। क्या इतनी संवेदनशील संस्था में इतनी साधारण लापरवाही होनी चाहिए? और अगर हो गई, तो क्या सिर्फ “सॉरी” कह देने से भरोसा वापस आ जाएगा? सरकारी फाइलों में छोटी गलती भी बड़े असर डालती है—और यहां तो मामला चुनाव का है।

टाइमिंग ही असली कहानी है

अगर यही घटना किसी शांत समय में होती, तो शायद यह खबर एक दिन में ठंडी पड़ जाती। लेकिन यहां मामला चुनाव से ठीक पहले का है। केरल में LDF, UDF और BJP के बीच कड़ा मुकाबला है। ऐसे में एक मुहर ने “मुद्दा” बनना ही था। राजनीति में टाइमिंग सब कुछ होती है—और इस बार टाइमिंग ने इस गलती को कई गुना बड़ा बना दिया।

संस्थाओं पर भरोसा—सबसे बड़ी पूंजी

लोकतंत्र सिर्फ चुनाव से नहीं चलता, बल्कि उन संस्थाओं से चलता है जो चुनाव कराती हैं। भारत निर्वाचन आयोग की सबसे बड़ी ताकत उसकी निष्पक्षता की छवि है। अगर उस छवि पर बार-बार सवाल उठेंगे, तो नुकसान सिर्फ एक संस्था का नहीं, पूरे सिस्टम का होगा। इसलिए यह जरूरी है कि चुनाव आयोग सिर्फ सफाई न दे, बल्कि ऐसे कदम भी दिखाए जिससे लोगों का भरोसा और मजबूत हो।

सियासत अपनी जगह, सच्चाई अपनी जगह

यह भी सच है कि हर गलती साजिश नहीं होती। कई बार फाइलों और दफ्तरों की दुनिया में ऐसी चूक हो जाती है। लेकिन जब मामला चुनाव आयोग जैसा हो, तो हर छोटी गलती भी बड़ी बन जाती है। विपक्ष इसे मुद्दा बनाएगा, सत्ता पक्ष इसे गलती बताएगा—लेकिन आम आदमी सिर्फ एक चीज चाहता है: भरोसा।

आखिर में सवाल वही—क्या सब ठीक है?

यह ‘मुहर कांड’ शायद कुछ दिनों में खबरों से गायब हो जाए, लेकिन जो सवाल इसने उठाए हैं, वे जल्दी नहीं जाएंगे। क्या हमारी संस्थाएं उतनी ही मजबूत हैं जितनी हम मानते हैं? क्या एक गलती सिर्फ गलती है या सिस्टम में कहीं ढील का संकेत? सियासत के शोर में असली बात यही है—लोकतंत्र में सिर्फ चुनाव जीतना जरूरी नहीं, भरोसा जीतना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

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