राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | चेन्नई/नई दिल्ली | 23 मार्च 2026
एनडीए खेमे में सीटों का फॉर्मूला तय, चुनावी जंग की औपचारिक शुरुआत
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने राज्य में सीटों के बंटवारे को लेकर बड़ा फैसला कर लिया है। समझौते के तहत भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) 27 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जबकि पट्टाली मक्कल काची (PMK) को 18 सीटें दी गई हैं और अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम (AMMK) 11 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। इस ऐलान के साथ ही राज्य में चुनावी समीकरण साफ होने लगे हैं और गठबंधन ने एकजुट होकर मुकाबले की रणनीति पर मुहर लगा दी है।
बीजेपी का विस्तार मिशन: दक्षिण में पकड़ मजबूत करने की कोशिश
बीजेपी लंबे समय से तमिलनाडु में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश में जुटी हुई है। 27 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला इस बात का संकेत है कि पार्टी अब राज्य में सिर्फ सहयोगी की भूमिका में नहीं रहना चाहती, बल्कि खुद को एक मजबूत विकल्प के तौर पर स्थापित करना चाहती है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, केंद्र की योजनाओं और संगठनात्मक मजबूती के दम पर वह इस बार बेहतर प्रदर्शन कर सकती है।
PMK और AMMK की भूमिका: सामाजिक समीकरण साधने की रणनीति
एनडीए गठबंधन में शामिल पीएमके और एएमएमके की भूमिका भी बेहद अहम मानी जा रही है। पीएमके का प्रभाव खास तौर पर वन्नियार समुदाय के बीच मजबूत है, जिससे उसे 18 सीटें दी गई हैं। वहीं एएमएमके, जो एआईएडीएमके से अलग होकर बनी पार्टी है, 11 सीटों पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करेगी। इन दोनों दलों के जरिए गठबंधन राज्य के विभिन्न जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की रणनीति पर काम कर रहा है।
डीएमके बनाम एनडीए: मुकाबला होगा सीधा और कड़ा
तमिलनाडु की राजनीति में इस बार मुख्य मुकाबला सत्ताधारी डीएमके गठबंधन और एनडीए के बीच देखने को मिल सकता है। डीएमके पहले से ही मजबूत संगठन और सत्ता में होने का फायदा लेकर मैदान में उतरेगी, वहीं एनडीए नए समीकरणों और संयुक्त रणनीति के साथ चुनौती पेश करेगा। ऐसे में चुनावी लड़ाई काफी दिलचस्प और कड़ी होने की संभावना है।
स्थानीय मुद्दों पर फोकस: रोजगार, विकास और क्षेत्रीय अस्मिता
इस चुनाव में सिर्फ राजनीतिक गठजोड़ ही नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्दे भी निर्णायक भूमिका निभाएंगे। बेरोजगारी, उद्योग, शिक्षा, बुनियादी ढांचा और क्षेत्रीय पहचान जैसे मुद्दे मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं। बीजेपी जहां विकास और केंद्र की योजनाओं को मुद्दा बना रही है, वहीं विपक्ष क्षेत्रीय अस्मिता और राज्य के अधिकारों को प्रमुखता दे रहा है।
चुनावी रणभेरी बज चुकी, अब नजर नतीजों पर
सीटों के बंटवारे के साथ ही तमिलनाडु में चुनावी रणभेरी पूरी तरह बज चुकी है। सभी दल अब उम्मीदवार चयन, प्रचार रणनीति और जनसंपर्क अभियान को तेज करने में जुट गए हैं। आने वाले दिनों में रैलियों, घोषणाओं और आरोप – प्रत्यारोप का दौर तेज होगा। अब देखना दिलचस्प होगा कि यह नया गठबंधन राज्य की राजनीति में कितना असर डाल पाता है और क्या वह डीएमके के मजबूत किले को चुनौती दे सकेगा।




