असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 12 मार्च 2026 को गुवाहाटी में ‘पंचायत आज तक’ कार्यक्रम में जो कुछ कहा, वो किसी भी लोकतंत्र में सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उन्होंने साफ-साफ माना कि राज्य में मौजूद करीब 70 लाख लोगों (जिन्हें वे मुख्य रूप से बांग्लादेशी मूल के ‘मिया मुस्लिम’ या अवैध घुसपैठिए बताते हैं) को जबरन भगाना संभव नहीं है। “मैं 70 लाख लोगों को भगा नहीं सकता। भारत में कोई ऐसी ट्रेन नहीं है जो 70 लाख लोगों को ले जा सके। यह मानवीय रूप से संभव नहीं है,” सरमा ने कहा। लेकिन फिर उन्होंने अपनी ‘रणनीति’ खोल दी – “मुझे उनके ऊपर दबाव बनाना पड़ेगा, ऐसा माहौल बनाना पड़ेगा कि वे खुद ही कहीं और चले जाएं। अगर कोई खुद को अवांछित महसूस करे, तो वह आखिरकार चला जाता है।”
यह बयान सिर्फ एक नेता की राय नहीं, बल्कि एक खुली योजना है – eviction drives, सरकारी योजनाओं से वंचित करना, रबर बुलेट्स का इस्तेमाल, और आर्थिक-सामाजिक दबाव डालकर लोगों को मजबूरन बाहर करने की। सरमा ने पहले भी कई बार कहा है कि 1971 के बाद आए इन लोगों की संख्या 70 लाख तक पहुंच चुकी है, और असम की मूल आबादी की पहचान बचाने के लिए यह जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या संविधान की भावना के खिलाफ ऐसी बातें कहना और लागू करना वैध है?
और सबसे चौंकाने वाली बात – इस बयान के बाद से अब तक (16 मार्च 2026 तक) प्रशासन, चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, मुख्यधारा मीडिया, विपक्ष, और केंद्र सरकार की तरफ से कोई ठोस कार्रवाई या आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई।
– सुप्रीम कोर्ट: पहले सरमा के ‘मिया’ वाले बयानों पर याचिकाएं दाखिल हुई थीं, लेकिन कोर्ट ने उन्हें हाई कोर्ट जाने को कहा। इस नए बयान पर कोई नई सुनवाई या नोटिस नहीं।
– चुनाव आयोग: असम में स्पेशल रिवीजन ऑफ वोटर लिस्ट चल रही है, जहां लाखों ‘डाउटफुल वोटर्स’ हटाए गए। लेकिन CM का यह खुलासा कि दबाव से लोग खुद चले जाएंगे – इस पर ECI की तरफ से कोई बयान या जांच नहीं।
– प्रशासन और पुलिस: असम पुलिस eviction और pushback कर रही है, लेकिन CM का यह बयान ‘माहौल बनाने’ का है – क्या यह hate speech या communal incitement नहीं? कोई FIR या जांच की खबर नहीं।
– मुख्यधारा मीडिया: कुछ चैनलों (जैसे Aaj Tak, News24) ने बयान दिखाया, लेकिन बड़े पैमाने पर आउटरेज या फॉलो-अप डिबेट नहीं। ज्यादातर कवरेज सेंसेशनल हेडलाइंस तक सीमित।
– केंद्र सरकार (PM, HM): पूरी खामोशी। असम BJP का गढ़ है, और 2026 विधानसभा चुनाव नजदीक हैं – शायद राजनीतिक मजबूरी।
– विपक्ष: कांग्रेस और AIUDF ने कुछ टिप्पणियां कीं, लेकिन कोई बड़ा आंदोलन या कोर्ट में नई याचिका नहीं दिखी।
यह खामोशी बताती है कि जब बात एक खास समुदाय की नागरिकता और अधिकारों की हो, तो संस्थाएं कितनी तेजी से चुप हो जाती हैं। सरमा का यह बयान ‘ethnic cleansing’ जैसी भाषा में आलोचना हो रही है – कुछ रिपोर्ट्स में इसे ‘genocidal rhetoric’ तक कहा गया। लेकिन कोई जवाबदेही नहीं।
क्या भारत का सेक्युलर ढांचा अब सिर्फ कागजों पर बचा है? क्या कोई आवाज बाकी है जो कह सके – नहीं, करोड़ों नागरिकों पर ‘दबाव’ और ‘माहौल’ बनाना गैर-कानूनी और अमानवीय है? स्थिति और बिगड़ने वाली है, क्योंकि सरमा ने संकेत दिया है कि यह अभियान जारी रहेगा। लेकिन जब तक संस्थाएं खामोश हैं, तब तक सवाल वही है – क्या इस देश में अब कोई फर्क पड़ता है?




