एक समय था जब मदरसे की पढ़ाई का मतलब केवल दीन की तालीम और धार्मिक ग्रंथों तक सीमित समझा जाता था। लेकिन आज का भारत एक नए मुस्लिम शिक्षा सुधार आंदोलन का साक्षी बन रहा है, जहाँ मदरसों में अब साइंस, गणित, कंप्यूटर, अंग्रेज़ी, और नागरिक अध्ययन जैसे विषय पढ़ाए जा रहे हैं। यह न सिर्फ मुसलमानों की शैक्षिक दशा को बदल रहा है, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था को एक नई सोच और दृष्टिकोण से जोड़ रहा है।
कहां से शुरू हुआ बदलाव?
2018 से लेकर 2024 तक उत्तर प्रदेश, केरल, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में कई मदरसों ने अपने पाठ्यक्रम में NCERT आधारित आधुनिक विषय जोड़े। केंद्र सरकार की “नई शिक्षा नीति 2020” में जब धार्मिक संस्थानों को भी आधुनिक शिक्षा से जोड़ने की बात आई, तब कई मुस्लिम शिक्षाविदों और उलेमाओं ने इसे समाज के लिए एक अवसर माना। वाराणसी के ‘मदरसा हिदायतुल इस्लाम’ ने 2021 में पहली बार अपने छात्रों को कंप्यूटर लैब दी और 2023 में साइंस टीचर नियुक्त किया। 2025 तक यहाँ के छात्रों ने स्टेट बोर्ड की परीक्षाएं दीं और दो छात्राओं का चयन इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में हो गया।
केरल मॉडल – सबक पूरे देश के लिए
केरल हमेशा से मुस्लिम शिक्षा में अग्रणी रहा है। यहाँ के SSLC पास प्रतिशत में मुस्लिम छात्र-छात्राओं की हिस्सेदारी 92% से अधिक है। मलप्पुरम और कोझीकोड में मदरसों ने खुद को ICT लैब्स, डिजिटल प्रोजेक्टर, स्मार्ट क्लासरूम और साइंस वर्कशॉप्स से लैस किया है।
“Samasta” बोर्ड के अंतर्गत चल रहे मदरसों में अब साप्ताहिक अंग्रेज़ी संवाद, करंट अफेयर्स पर बहस और तकनीकी वर्कशॉप आयोजित की जाती हैं। छात्र अब कुरान के साथ कोडिंग भी पढ़ रहे हैं।
भोपाल से हैदराबाद तक – जागरूकता से क्रांति तक
भोपाल के ‘मदरसा ताजुल उलूम’ ने 2022 में CBSE पैटर्न अपनाया। यहाँ के छात्रों को कंप्यूटर साक्षरता, नागरिक शिक्षा और बायोलॉजी पढ़ाई जा रही है। इसके साथ महिलाओं के लिए अलग विज्ञान विंग भी खोली गई है। वहीं, हैदराबाद के ‘जमातुल फुरकान’ नामक मदरसे में छात्र ड्रोन टेक्नोलॉजी और साइबर सिक्योरिटी जैसे विषयों की बुनियादी जानकारी ले रहे हैं। डॉ. अब्दुल सत्तार, एक मुस्लिम एजुकेशनिस्ट कहते हैं, “हमारा मक़सद अब सिर्फ दीनी तालीम नहीं, बल्कि दुनियावी तरक्की के लिए मुकम्मल इंसान तैयार करना है।”
क्या कहती है सरकार और समाज?
केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने मिलकर मदरसा आधुनिकीकरण योजना के तहत अनुदान, कंप्यूटर, शिक्षक ट्रेनिंग और पाठ्यक्रम डिजिटलीकरण जैसे कदम उठाए हैं। 2024 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट में बताया गया कि लगभग 38,000 से अधिक मदरसों में विज्ञान और गणित की पढ़ाई शुरू हो चुकी है।
वहीं समाज में भी मदरसों को लेकर पुरानी धारणाएं टूट रही हैं। शफीक कुरैशी, जो एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं और खुद मदरसे से पढ़े हैं, कहते हैं, “अब हमें अपने बच्चों को सिर्फ ‘मौलवी’ नहीं, ‘मौलवी इंजीनियर’ बनाना है। दोनों भूमिकाओं में समाज को रोशनी चाहिए।”
बदलते मदरसों की कुछ प्रेरक कहानियां
- रुकैया फातिमा – लखनऊ के मदरसे से पढ़ीं, अब AMU में बायोकेमिस्ट्री की छात्रा।
- नासिर कुरैशी – भोपाल के मदरसे से गणित पढ़ा, अब IIT पटना में रिसर्च स्कॉलर।
- हबीबा यूसुफ – केरल की छात्रा, मदरसे में कोडिंग सीखकर स्टार्टअप शुरू किया।
- सैफुल्लाह खान – हैदराबाद के मदरसे से पढ़कर UPSC क्लियर किया, अब IAS अधिकारी।
क्या कहता है डेटा?
- वर्ष 2020 में जहाँ केवल 6% मदरसों में आधुनिक विषय पढ़ाए जाते थे, 2025 में यह संख्या 45% तक पहुँच चुकी है।
- 75% मदरसे अब वाई-फाई और डिजिटल डिवाइसेज़ से जुड़े हैं।
- 10 राज्यों में मदरसे UDISE+ शिक्षा डेटा सिस्टम में शामिल किए गए हैं।
नतीजा – एक नया मुसलमान तैयार हो रहा है
यह बदलाव इस बात का संकेत है कि भारतीय मुसलमानों ने शिक्षा को लेकर अब कोई समझौता नहीं करना तय किया है। वे दीन और दुनिया दोनों को अपनाकर एक सभ्य, समझदार और समर्पित नागरिक बनना चाहते हैं। मदरसा अब सिर्फ अज़ान की गूंज तक सीमित नहीं, बल्कि डिजिटल भारत की लैब बन चुके हैं।
आज जब एक मदरसे का छात्र कोडिंग सिखाकर स्टार्टअप शुरू करता है, जब एक छात्रा बायोलॉजी में रिसर्च स्कॉलर बनती है, तो यह साफ हो जाता है कि शिक्षा के मैदान में मुसलमानों का नया सूरज उग चुका है।




