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कांशीराम की विरासत पर सियासी जंग: राहुल गांधी का बयान बीजेपी को क्यों चुभ रहा है?

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एबीसी नेशनल न्यूज | लखनऊ/नई दिल्ली | 14 मार्च 2026

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की जयंती पर कांग्रेस द्वारा आयोजित कार्यक्रम में राहुल गांधी का एक बयान अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में तीखी बहस का कारण बन गया है। लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित ‘सामाजिक परिवर्तन दिवस’ कार्यक्रम में राहुल गांधी ने कहा कि अगर जवाहरलाल नेहरू जीवित होते तो कांशीराम कांग्रेस से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन सकते थे। उन्होंने यह भी माना कि कांग्रेस की कमियों के कारण ही कांशीराम को अलग रास्ता चुनना पड़ा और वे अपने आंदोलन में सफल हुए।

राहुल गांधी ने कार्यक्रम में कहा, “अगर कांग्रेस पार्टी अपना काम सही तरीके से करती तो कांशीराम जी को अलग रास्ता नहीं बनाना पड़ता। मैंने एक दिन कहा था कि अगर जवाहरलाल नेहरू जिंदा होते तो कांशीराम कांग्रेस के मुख्यमंत्री होते।” राहुल ने कांशीराम को सामाजिक न्याय की लड़ाई का बड़ा नेता बताते हुए कहा कि उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और महात्मा गांधी तथा डॉ. भीमराव अंबेडकर की तरह सामाजिक परिवर्तन के लिए संघर्ष किया। कार्यक्रम में कांग्रेस नेताओं ने कांशीराम को मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग भी उठाई।

हालांकि राहुल गांधी के इस बयान के बाद बीजेपी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उत्तर प्रदेश सरकार के समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण ने राहुल गांधी के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि यह मान्यवर कांशीराम के संघर्ष और विचारों का अपमान है। असीम अरुण ने कहा कि कांशीराम ने अपना पूरा राजनीतिक जीवन कांग्रेस के विरोध में बिताया और बसपा की स्थापना भी कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ दलितों को संगठित करने के उद्देश्य से की गई थी। उन्होंने राहुल गांधी को कांशीराम की किताब “चमचा युग” पढ़ने की सलाह भी दी, जिसमें कांग्रेस की दलित राजनीति की आलोचना की गई थी।

असीम अरुण के बयान पर कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने कड़ा पलटवार किया। लल्लू ने कहा कि उन्हें लगता था कि लोग पढ़-लिखकर यूपीएससी परीक्षा पास करते हैं, लेकिन असीम अरुण की बातें सुनकर लगता है कि कुछ लोग इतिहास समझे बिना भी परीक्षा पास कर जाते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि आरएसएस और हिंदू महासभा डॉ. अंबेडकर को कानून मंत्री बनने से क्यों रोकना चाहते थे और हिंदू कोड बिल का इतना विरोध क्यों किया गया, जिसके कारण डॉ. अंबेडकर को अंततः मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

अजय कुमार लल्लू ने यह भी कहा कि दलित और पिछड़ा समाज हमेशा कांग्रेस की राजनीति के केंद्र में रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ही डॉ. अंबेडकर को संविधान निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी, उन्हें संसद में भेजा और अपने मंत्रिमंडल में स्थान दिया। लल्लू ने कहा कि राहुल गांधी ने केवल यह कहा कि अगर नेहरू के समय कांशीराम जैसे नेता होते तो उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जा सकता था, इसमें आपत्ति की कोई वजह नहीं है।

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति को केंद्र में ला दिया है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही कांशीराम की विरासत को अपने-अपने तरीके से प्रस्तुत कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट बैंक को लेकर यह बहस और तेज हो सकती है, क्योंकि उत्तर प्रदेश की सत्ता की राजनीति में यह वर्ग निर्णायक भूमिका निभाता है।

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