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क्या मिला गलगोटिया और सरकार को झूठ बोलने से? ग्लोबल स्तर पर हुई बदनामी का हिसाब कौन देगा?

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एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 19 फरवरी 2026

रोबोडॉग विवाद ने केवल एक दावे की सच्चाई पर सवाल नहीं उठाए, बल्कि यह भी पूछा है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जल्दबाज़ी और अतिशयोक्ति से आखिर हासिल क्या होता है? जब Galgotias University से जुड़ा दावा बड़े स्तर पर प्रचारित हुआ और बाद में उसे लेकर सफाई देनी पड़ी, तो यह मामला संस्थागत विश्वसनीयता से आगे बढ़कर राष्ट्रीय छवि से भी जुड़ गया।

यदि किसी तकनीकी उपलब्धि को मौलिक नवाचार के रूप में प्रस्तुत किया गया और बाद में यह स्पष्ट हुआ कि मामला वैसा नहीं था जैसा प्रचारित किया गया, तो यह केवल “कम्युनिकेशन गैप” नहीं कहलाता। यह उस प्रवृत्ति का संकेत देता है जिसमें ब्रांडिंग और सुर्खियां, अकादमिक ईमानदारी पर भारी पड़ने लगती हैं। शिक्षा संस्थानों का उद्देश्य ज्ञान निर्माण है, न कि इवेंट मैनेजमेंट।

सबसे बड़ा नुकसान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होता है। आज भारतीय विश्वविद्यालय वैश्विक रैंकिंग, विदेशी सहयोग और अंतरराष्ट्रीय छात्रों को आकर्षित करने की होड़ में हैं। ऐसे में यदि किसी दावे को लेकर विवाद उठता है, तो विदेशों में यह संदेश जाता है कि यहां उपलब्धियों की सत्यता पर प्रश्नचिह्न है। यह केवल एक संस्थान की नहीं, पूरे उच्च शिक्षा तंत्र की छवि पर असर डालता है।

सरकार की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती है, यदि किसी दावे को आधिकारिक मंचों या सरकारी समर्थन के साथ प्रस्तुत किया गया हो। जब सत्ता और शिक्षा साथ खड़े होकर किसी उपलब्धि का प्रचार करते हैं, तो उसकी विश्वसनीयता और बढ़ जाती है। ऐसे में बाद की सफाई और भी असहज स्थिति पैदा करती है।

यह भी सच है कि प्रतिस्पर्धा के दौर में संस्थान अपनी उपलब्धियों को आक्रामक तरीके से पेश करते हैं। लेकिन अंतर यही है—प्रचार और प्रामाणिकता के बीच संतुलन का। यदि संतुलन बिगड़ता है, तो अल्पकालिक सुर्खियां दीर्घकालिक बदनामी में बदल जाती हैं।

रोबोडॉग विवाद से सीख यही है कि शिक्षा में पारदर्शिता सर्वोपरि है। यदि तकनीक साझेदारी से आई है, तो स्पष्ट रूप से बताया जाए। यदि शोध प्रारंभिक चरण में है, तो उसे उसी रूप में प्रस्तुत किया जाए। अतिशयोक्ति से तालियां भले मिल जाएं, लेकिन भरोसा खो जाए तो उसे वापस पाना कठिन होता है।

अंततः प्रश्न यही है—क्या कुछ दिनों की चर्चा के लिए वर्षों की साख दांव पर लगाना उचित था? शिक्षा संस्थान और सरकार, दोनों के लिए यह आत्ममंथन का समय है। क्योंकि ग्लोबल मंच पर प्रतिष्ठा केवल दावों से नहीं, प्रमाणों से बनती है।

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