एबीसी नेशनल न्यूज | चंडीगढ़ / नई दिल्ली | 16 फरवरी 2026
पंजाब की राजनीति में पिछले चार दिनों में जो घटनाक्रम सामने आया है, उसने सिर्फ एक नेता की राजनीतिक दिशा नहीं, सत्ता और जांच एजेंसियों के रिश्तों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के एक बयान से शुरू हुआ मामला अब ED नोटिस, राजनीतिक सफाई और अधिकारी के तबादले तक पहुंच चुका है। विपक्ष इसे “संयोग नहीं, संदेश” बता रहा है, जबकि बीजेपी इसे महज कानूनी प्रक्रिया करार दे रही है।
इशारा कांग्रेस की ओर… और ED की एंट्री
चार दिन पहले, 12 फरवरी को कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सार्वजनिक मंच पर कहा था कि बीजेपी में उनसे पर्याप्त सलाह नहीं ली जाती। राजनीतिक हलकों में इसे संभावित “घर वापसी” का संकेत माना गया। लेकिन बयान के बाद अगले दिन ही प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से उन्हें फेमा (FEMA) से जुड़े मामले में नोटिस जारी कर दिया गया।
मामला भले पुराना बताया जा रहा हो, लेकिन नोटिस के समय ने सवालों की बाढ़ ला दी है। विपक्ष पूछ रहा है—क्या यह महज इत्तफाक है, या किसी को लाइन में रखने का तरीका?
अगले दिन सफाई… “कहीं नहीं जा रहे”
ED नोटिस के अगले ही दिन कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्नी मीडिया के सामने हांपते कांपते आईं और साफ शब्दों में कहा कि वे बीजेपी में थे, बीजेपी में हैं और बीजेपी में ही रहेंगे। राजनीतिक विश्लेषक इसे “डैमेज कंट्रोल” मान रहे हैं। इस बयान के बाद कांग्रेस में वापसी की अटकलों पर विराम लग गया।
लेकिन यहीं से कहानी और दिलचस्प हो गई।
नोटिस भेजने वाले अफसर का ट्रांसफर
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि जिस ED अधिकारी ने नोटिस जारी किया था, उसका तबादला दिल्ली से करीब 2700 किलोमीटर दूर चेन्नई कर दिया गया। विपक्ष ने इसे “पनिशमेंट पोस्टिंग” करार देते हुए कहा कि संदेश साफ है—जो सत्ता की लाइन से हटेगा, उसे कीमत चुकानी पड़ेगी।
सरकार की ओर से इसे नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बताया गया है। लेकिन सवाल अब भी तैर रहे हैं—क्या इतने बड़े संयोग बार-बार यूं ही हो जाते हैं?
एजेंसियां या राजनीतिक औजार?
यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर उस बहस को तेज कर रहा है कि क्या केंद्रीय जांच एजेंसियां पूरी तरह स्वतंत्र हैं या राजनीतिक परिस्थितियों का असर उन पर पड़ता है। भाजपा कहती है कि कानून अपना काम करता है, चाहे कोई भी हो। विपक्ष का तर्क है कि कार्रवाई की टाइमिंग ही सब कुछ कह देती है।
सत्ता का संदेश या महज प्रक्रिया?
कैप्टन अमरिंदर सिंह फिलहाल चुप हैं। ED भी अपने आधिकारिक बयान में सिर्फ “कानूनी प्रक्रिया” की बात कर रही है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह सवाल गूंज रहा है—क्या यह लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया है या असहमति की कीमत?
व्यंग्य में लोग कह रहे हैं—“घर वापसी करोगे तो ED जाएगी, रुक जाओगे तो अधिकारी जाएगा।” सच्चाई क्या है, यह आने वाला समय और जांच की दिशा ही तय करेगी। लेकिन इतना तय है कि यह प्रकरण सत्ता और एजेंसियों के रिश्ते पर नई बहस छेड़ चुका है।




