एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 12 फरवरी 2026
Mallikarjun Kharge ने ओडिशा के एक आंगनवाड़ी केंद्र में जातिगत भेदभाव की घटना को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जिस देश में सामाजिक न्याय, समानता और समावेशी विकास की बातें की जाती हैं, वहां अगर एक दलित महिला हेल्पर/कुक द्वारा बनाए गए भोजन को एक समुदाय विशेष के लोग अपने बच्चों को देने से मना कर दें और महीनों तक आंगनवाड़ी केंद्र का बहिष्कार जारी रहे, तो यह केवल एक स्थानीय घटना नहीं बल्कि संविधान की आत्मा पर सीधा प्रहार है। खड़गे ने आरोप लगाया कि तीन महीने से अधिक समय से चल रहा यह बहिष्कार बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर सीधा असर डाल रहा है, क्योंकि आंगनवाड़ी केंद्र देश में पोषण, प्रारंभिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बुनियादी कड़ी हैं।
खड़गे ने कहा कि यह मामला संविधान के अनुच्छेद 21(ए) के तहत शिक्षा के अधिकार और अनुच्छेद 47 के तहत राज्य की उस जिम्मेदारी का खुला उल्लंघन है, जिसमें पोषण स्तर बढ़ाने और जनस्वास्थ्य सुधारने का दायित्व स्पष्ट रूप से निहित है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब राज्य और केंद्र सरकारें सामाजिक सुधार और विकास की उपलब्धियों का दावा करती हैं, तो फिर जमीनी स्तर पर इस तरह का जातिगत बहिष्कार क्यों जारी है? उनके अनुसार, यह घटना दिखाती है कि जातिगत पूर्वाग्रह केवल सामाजिक मानसिकता का हिस्सा नहीं, बल्कि संस्थागत ढांचे में भी कहीं न कहीं जड़ें जमाए हुए हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष ने इस प्रकरण को कार्यस्थल पर होने वाले जातिगत भेदभाव का उदाहरण बताते हुए कहा कि हाल के वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों से कई चौंकाने वाली घटनाएं सामने आई हैं—मध्य प्रदेश में एक आदिवासी मजदूर के साथ अमानवीय व्यवहार, गुजरात में एक दलित सरकारी कर्मचारी की आत्महत्या के पीछे कथित उत्पीड़न, और चंडीगढ़ में पुलिस बल के भीतर संस्थागत भेदभाव के आरोप—ये सब संकेत देते हैं कि समस्या गहरी है और केवल भाषणों से खत्म नहीं होने वाली। खड़गे ने कहा कि किसी भी कर्मचारी के साथ उसकी जाति के आधार पर भेदभाव करना न केवल असंवैधानिक है बल्कि दंडनीय अपराध भी है।
उन्होंने मांग की कि ओडिशा की घटना में समयबद्ध जांच हो, दोषियों की पहचान की जाए और सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि स्पष्ट संदेश जाए कि संविधान से ऊपर कोई नहीं है। खड़गे ने कहा कि यदि बच्चों के पोषण और शिक्षा जैसे बुनियादी अधिकार भी जातिगत पूर्वाग्रहों की भेंट चढ़ने लगें, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है। राजनीतिक हलकों में इस बयान के बाद बहस तेज हो गई है और अब सबकी नजर इस बात पर है कि संबंधित राज्य प्रशासन और केंद्र सरकार इस मामले में क्या कदम उठाते हैं।




