एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 12 फरवरी 2026
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi ने मीडिया के एक वर्ग पर तीखा हमला बोलते हुए उसे लोकतंत्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी याद दिलाई। पत्रकारों से सीधे संवाद में उन्होंने कहा, “आप पूरी तरह बीजेपी द्वारा नियुक्त नहीं हैं। कम से कम थोड़ा निष्पक्ष रिपोर्टिंग करने की कोशिश कीजिए। यह बेहद शर्मनाक हो चुका है – अब बहुत हो गया।” उनके इस बयान ने राजनीतिक और मीडिया जगत में नई बहस छेड़ दी है।
राहुल गांधी ने आगे कहा, “आप जिम्मेदार लोग हैं। आपकी जिम्मेदारी है कि आप निष्पक्ष रहें। आप हर दिन बीजेपी जो शब्द आपको देती है, उसी के आधार पर पूरा शो नहीं चला सकते। आप इस देश के साथ अन्याय कर रहे हैं। क्या आपको यह समझ में नहीं आता?” यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब संसद सत्र के दौरान कई मुद्दों—आर्थिक नीतियों, कॉरपोरेट संबंधों, विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा—पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं।
मीडिया की भूमिका पर सवाल
कांग्रेस का आरोप है कि पिछले एक दशक में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकार के प्रति नरम रुख अपनाता रहा है और विपक्षी नेताओं को अक्सर नकारात्मक परिप्रेक्ष्य में पेश किया जाता है। पार्टी नेताओं का कहना है कि बेरोजगारी, महंगाई, सीमा विवाद, संस्थागत स्वायत्तता और बड़े कॉरपोरेट समूहों से जुड़े सवालों पर गहन पड़ताल की बजाय बहस का रुख विपक्ष की आलोचना की ओर मोड़ दिया जाता है।
कुछ कांग्रेस नेताओं ने बड़े उद्योगपतियों—Mukesh Ambani और Gautam Adani—के मीडिया क्षेत्र में बढ़ते निवेश का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे संपादकीय स्वतंत्रता पर सवाल उठते हैं। हालांकि इन आरोपों पर संबंधित समूहों या सरकार की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
भाजपा का पलटवार
Bharatiya Janata Party ने राहुल गांधी के बयान की आलोचना करते हुए कहा है कि भारत में मीडिया स्वतंत्र है और वह अपने संपादकीय निर्णय स्वयं लेता है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि मीडिया पर “गुलामी” जैसे आरोप लगाना लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रेस की साख पर हमला है। भाजपा का कहना है कि देश में अनेक मीडिया मंच सक्रिय हैं जो सरकार की आलोचना भी करते हैं।
व्यापक बहस
विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मीडिया स्वामित्व, कॉरपोरेट प्रभाव, विज्ञापन निर्भरता और प्रेस की स्वतंत्रता जैसे व्यापक मुद्दों से जुड़ा है। अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता सूचकांकों में भारत की स्थिति को लेकर समय-समय पर चर्चा होती रही है। विपक्ष इन सूचकांकों का हवाला देकर मीडिया पर दबाव की बात करता है, जबकि सरकार इन आकलनों को पक्षपाती बताती रही है।
राहुल गांधी का बयान ऐसे समय आया है जब संसद के भीतर राजनीतिक टकराव पहले से ही चरम पर है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं—कुछ इसे सत्ता से सवाल पूछने की वैध अपील मान रहे हैं, तो कुछ इसे मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला बता रहे हैं।
फिलहाल इतना तय है कि “गोदी मीडिया” बनाम “स्वतंत्र मीडिया” की बहस आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है, और यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बना रहेगा।




