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बांग्लादेश में बढ़ता चीन का असर

बांग्लादेश में बढ़ता चीन का असर, लेकिन भारत को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं

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एबीसी नेशनल न्यूज | ढाका/नई दिल्ली | 10 फरवरी 2026

बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों से ठीक पहले और उसके बाद की संभावित राजनीतिक तस्वीर को लेकर क्षेत्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों और कूटनीतिक हलकों का मानना है कि इन चुनावों के बाद बांग्लादेश में चीन का प्रभाव और गहराने की पूरी संभावना है। इसकी सबसे बड़ी वजह 2024 में भारत के करीबी माने जाने वाले नेतृत्व का सत्ता से हटना माना जा रहा है, जिसके बाद बीजिंग को ढाका में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करने का नया अवसर मिला। हालांकि, विशेषज्ञ इस बात पर भी एकमत हैं कि तमाम बदलावों के बावजूद भारत जैसे बड़े, पड़ोसी और ऐतिहासिक रूप से जुड़े देश को बांग्लादेश पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।

2024 में लंबे समय तक सत्ता में रहीं और नई दिल्ली के साथ मजबूत संबंध रखने वाली शेख हसीना के सत्ता से बाहर होने को दक्षिण एशिया की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा गया था। उनके हटने के बाद बांग्लादेश की विदेश नीति में संतुलन की दिशा बदलती दिखाई दी और इसी खाली जगह को भरने के लिए चीन ने अपने कूटनीतिक और आर्थिक प्रयास तेज कर दिए। बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, संचार और रक्षा सहयोग के क्षेत्रों में चीन ने बांग्लादेश को बड़े निवेश और परियोजनाओं का प्रस्ताव दिया, जिससे दोनों देशों के रिश्ते और गहरे होते नजर आए।

बांग्लादेश के राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि चीन की मौजूदगी अब केवल कागज़ी समझौतों तक सीमित नहीं रही, बल्कि जमीन पर दिखाई देने लगी है। बंदरगाहों के आधुनिकीकरण, सड़कों और पुलों के निर्माण, बिजली परियोजनाओं और डिजिटल कनेक्टिविटी में चीनी कंपनियों की भागीदारी लगातार बढ़ी है। चीन पहले से ही बांग्लादेश का एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है और चुनाव के बाद बनने वाली नई सरकार के सामने आर्थिक विकास और रोज़गार सृजन सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी। ऐसे में बीजिंग की ओर से मिलने वाले निवेश प्रस्ताव ढाका के लिए आकर्षक साबित हो सकते हैं।

इसके साथ ही विशेषज्ञ यह भी याद दिला रहे हैं कि बांग्लादेश के लिए भारत की अहमियत केवल राजनीतिक समीकरणों तक सीमित नहीं है। भारत और बांग्लादेश के बीच हजारों किलोमीटर लंबी साझा सीमा, ऐतिहासिक-सांस्कृतिक रिश्ते, व्यापक व्यापार, नदी जल बंटवारे और सुरक्षा सहयोग जैसे कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ करना किसी भी सरकार के लिए व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। खासकर सीमा प्रबंधन, अवैध घुसपैठ, तस्करी और आतंकवाद जैसे विषयों पर भारत-बांग्लादेश सहयोग लंबे समय से दोनों देशों के हित में रहा है।

भारतीय रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश की नई राजनीतिक व्यवस्था एक संतुलनकारी विदेश नीति अपनाने की कोशिश करेगी। इसका मतलब यह होगा कि एक तरफ चीन के साथ आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते बढ़ाए जाएंगे, तो दूसरी तरफ भारत के साथ दशकों पुराने संबंधों को पूरी तरह टूटने नहीं दिया जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार ढाका की नीति “एक के पक्ष में दूसरे को नाराज़ न करना” जैसी हो सकती है, ताकि उसे दोनों शक्तियों से अधिकतम लाभ मिल सके।

क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर भी चिंताएं सामने आ रही हैं। भारत लंबे समय से बांग्लादेश के साथ पूर्वोत्तर भारत की स्थिरता, सीमा सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग करता आया है। विश्लेषकों का कहना है कि इन संवेदनशील मामलों में भारत की भूमिका को कमजोर करना बांग्लादेश के लिए भी जोखिम भरा हो सकता है। यही कारण है कि चाहे चीन का प्रभाव कितना ही क्यों न बढ़े, भारत के साथ सुरक्षा और रणनीतिक संवाद बनाए रखना ढाका की मजबूरी भी है।

बांग्लादेश में चुनावों के बाद चीन का प्रभाव बढ़ना लगभग तय माना जा रहा है, लेकिन भारत की भौगोलिक, ऐतिहासिक और रणनीतिक मौजूदगी इतनी गहरी है कि उसे पूरी तरह दरकिनार करना आसान नहीं होगा। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि नई सरकार किस तरह बीजिंग और नई दिल्ली के बीच संतुलन साधते हुए अपनी विदेश नीति को आगे बढ़ाती है और दक्षिण एशिया की बदलती राजनीति में अपनी जगह तय करती है।

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